Tuesday, 9 April 2019

लक्ष्मी कांतम्मा- कम्युनिस्टों का किला बेध कर संसद में पहुंची


(महिला सांसद 27 ) 
लक्ष्मी कांतम्मा तीसरी लोकसभा में 1962 में आंध्र प्रदेश के खम्मम क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचीं। कांताम्मा 1967 और 1971 का चुनाव भी कांग्रेस के टिकट पर जीता। लक्ष्मी ने संसद में प्रखर वक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनके पहले खम्मम लोकसभा सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी के नेता चुनाव जीत रहे थे। कांतम्मा ने वामपंथियों के किले को बेधने में सफलता पाई थी।
उच्च शिक्षित और प्रखर वक्ता
तेलंगाना के महबबूनगर जिले के नामी रेड्डी जमींदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली लक्ष्मी बौद्धिक तौर पर प्रखर थीं। लंबी, छरहरी कदकाठी वाली लक्ष्मी उच्च शिक्षित और अपने समय की प्रखर वक्ता थीं। राजनीति में कदम रखने के बाद लक्ष्मी कांताम्मा  ने1957 में खम्मम से आंध्र प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता था। उन्होंने 33 साल की उम्र में कम्युनिस्टों के अजेय गढ़ में जीत दर्ज कराकर खुद को राजनीति में स्थापित किया। आंध्र प्रदेश की राजनीति में वे पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की काफी करीबी मानी जाती थीं।
वामपंथ की ओर झुकाव
लक्ष्मी कांतमा की स्कूली पढ़ाई कई शहरों में हुई। उन्होंने मछलीपट्टनम ने बीए और चेन्नई से एमए की पढ़ाई की। छात्र जीवन में उनका झुकाव वामपंथी छात्र संगठनों की की तरफ रहा पर उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की जगह आगे कांग्रेस का दामन थामा। उनके पति वन सेवा के अधिकारी थे।
इमरजेंसी का विरोध किया
भारत-चीन युद्ध के समय 1962 में कांतम्मा ने राइफल चलाने का प्रशिक्षण लिया साथ ही शूटिंग में दो पुरस्कार भी जीते। उन्होंने महिलाओं के पिता की संपत्ति में 50 फीसदी अधिकार दिलाने के लिए कई बार सांसद के तौर पर आवाज उठाई। हालांकि वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की करीबी थीं पर उन्होंने इमरजेंसी लगाने का विरोध किया। कांतम्मा को अपनी जीप खुद चलाना पसंद था। जीवन के आखिरी वक्त तक वे सक्रिय रहीं।
बाद में साध्वी बन गईं
अस्सी के दशक में लक्ष्मी ने राजनीति से अपने सारे संपर्क तोड़कर आध्यात्म की ओर रूख किया। वे साध्वी बन गईं। वे गुरु श्रीशिवा बालयोगी महाराज के शरण में चली गईं। उन्होंने अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा धर्मार्थ कामों में दान में दे दिया।

सफरनामा
1924 में 16 जुलाई को तेलंगाना में उनका जन्म हुआ।
1944 में 1 नवंबर को टी वेंकट सुब्बाराव से उनका विवाह हुआ।
1957 में खम्मम से आंध्र प्रदेश विधानसभा का चुनाव जीता। 
2007 में 13 दिसंबर को विजयवाड़ा में उनका निधन हो गया।


Monday, 8 April 2019

मैत्रेयी बोस - डॉक्टरी छोड़ मजदूरों के कल्याण में जीवन लगाया


(महिला सांसद - 26 ) 
पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग से 1967 में चौथी लोकसभा में चुनाव जीत कर पहुंची मैत्रेयी बोस अपने समय की जानी मानी चिकित्सक थीं। पर डॉक्टरी छोड़कर वे भारत छोड़ो आंदोलन में कूदीं और बाद में पूरा जीवन मजदूरों, महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।
दार्जिलिंग से उन्होंने लोकसभा का चुनाव स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर जीता था। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार और मौजूदा सांसद टी मनन को हराया था। दार्जिलिंग के सांसद के तौर पर लोकसभा में वे नेपाली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए निजी विधेयक लेकर आई थीं। मैत्रेयी बोस ने 1952 में पहले लोकसभा चुनाव में घाटल से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था, तब वे दूसरे स्थान पर रही थीं।
बंगाल की राजनीति में
सांसद बनने से पहले वे ट्रेड यूनियन संगठनों के साथ ही पश्चिम बंगाल की राजनीति में सक्रिय थीं। वे 1954 से 1967 तक कांग्रेस पार्टी से राज्य विधानसभा की सदस्य रहीं। उन्होंने 1964 में जापान के हिरोसीमा और नागासकी में एंटी बम कान्फ्रेंस में हिस्सा लिया था।
म्युनिख से एमडी किया
मैत्रेयी बोस के पिता शशिभूषण बोस गिरिहीह शहर के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। स्कूली पढ़ाई के बाद वे उच्च अध्ययन के लिए कोलकाता पहुंची। कोलकाता मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद उन्होंने म्यूनिख से एमडी किया था। भारत लौटने पर उन्होंने एक डाक्टर के तौर पर मेडिकल प्रैक्टिस शुरू की। पर सन 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में कूदने के बाद उन्होंने प्रैक्टिस छोड़ दी।
इंटक की राष्ट्रीय अध्यक्ष
डॉक्टर मैत्रेयी बोस का मजदूर आंदोलन से काफी जुड़ाव रहा। वे 1943 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के संपर्क में आईं। सन 1948 में वे इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस से जुड़ गईं। वे 1955 से 1962 तक इंटक की बंगाल शाखा की अध्यक्ष भी रहीं। वे 1962-63 में इंटक की राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुनीं गईं।
अनाथ बच्चों के लिए काम
बाल कल्याण के लिए काम करने वाली संस्था के लिए 1944 में उन्होंने सेव द चिल्ड्रेन कमेटी के लिए मानद सेक्रेट्री के तौर पर काम करना शुरू किया। अनाथ बच्चों के लिए उन्होंने छह अनाथलायों की स्थापना करवाई जिसमें 600 निराश्रित बच्चों को घर मिला। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में एंबुलेंस सेवाएं शुरू करवाई। कोलकाता के पास महिलाओं और बच्चों के लिए अस्पताल खुलवाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
चिकित्सा पर पुस्तकें लिखीं
उन्होंने मजदूर संगठन के सम्मेलन में हिस्सा लेने के क्रम में जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया,. फ्रांस, जापान जैसे देशों का दौरा किया था। संसदीय पारी खत्म होने के बाद वे कोलकाता के ठाकुर पुकुर रोड में रहने लगीं। डॉक्टर मैत्रेयी बोस की रूचि पुरातत्व, वास्तुशास्त्र और भारतीय दर्शन में भी रहा। उन्होंने ट्रेड यूनियन और महिलाओं और बच्चों की चिकित्सा पर कुछ लघु पुस्तकें लिखीं और अखबारों में कई लेख भी लिखे।
सफरनामा
1905 में सात अक्तूबर को गिरिडीह ( तब बिहार) में उनका जन्म हुआ।
1937 में 29 अगस्त को उनका विवाह स्वदेश बसु से हुआ
1942 से 1967 तक वे कांग्रेस पार्टी की सदस्य रहीं।
1954 में पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुनी गईं
1967 में स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर दार्जिलिंग से लोकसभा चुनाव जीता।
1999 में उनका कोलकाता में निधन हो गया।


Sunday, 7 April 2019

मैमूना सुल्तान -भोपाल को राजधानी बनाने के लिए संघर्ष किया


(महिला सांसद-25 ) 
झीलों की नगरी के रूप में प्रसिद्ध मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल 1957 में जब संसदीय सीट के तौर पर अस्तित्व में आया तो मैमूना सुल्तान के रूप में पहली महिला सांसद मिलीं। कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने वाली मैमूना स्वतंत्रा आंदोलन से जुडी थीं और भोपाल को राजधानी बनाने के लिए संघर्ष करने वालों में शामिल थीं। मैमूना दूसरी बार 1962 में भी भोपाल से सांसद चुनी गईं।
भोपाल की पहली महिला सांसद
भोपाल जब रियासत हुआ करता था तो लगातार 82 साल तक यहां महिला नवाबों ने शासन किया था। पर आजादी के बाद एक बार फिर भोपाल को एक महिला सांसद का प्रतिनिधित्व मिला। पहले लोकसभा चुनाव में रायसेन और सीहोर दो अलग अलग लोकसभा क्षेत्र भोपाल प्रांत में थे। पर 1956 में मध्य प्रदेश राज्य के गठन के बाद दोनों लोकसभा सीटों को मिलाकर भोपाल लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया। भोपाल लोकसभा क्षेत्र पर पहली बार हुए चुनाव में कांग्रेस ने मैमूना सुल्तान को उम्मीदवार बनाया। भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर कहते हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मैमूना कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता थीं। भोपाल को राजधानी बनाने के आंदोलन में भी उन्होंने सक्रियता से हिस्सा लिया था।
अफगानिस्तान के शाह की वंशज
मैमूना के परदादा शाह सूजा अफगानिस्तान के रहने वाले थे, जो दुर्रानी सम्राज्य के शासक थे। कांग्रेस नेता मैमूना सुल्तान के के पिता मोहम्मद असगर अंसारी थे जो आईसीएस अधिकारी थे। वे केंद्र सरकार में कृषि मंत्रालय में सचिव रहे। भोपाल के आखिरी नवाब हमिदुल्ला खान की पत्नी का नाम भी मैमूना सुल्तान ही था। दोनों समकालीन थीं, पर उनकी पहचान अलग थी। सांसद मैमूना की छोटी बहन सलमा सुल्तान दूरदर्शन की लोकप्रिय समाचार वाचिका थीं।
दो बार जनसंघ उम्मीदवार को हराया
मैमूना सुल्तान ने 1957 में अपने पहले चुनाव में हिंदू महासभा के हरदयाल देवगांव को शिकस्त दी। इसके बाद उन्होंने 1962 के लोकसभा चुनाव में भी लगातार दूसरी बार हिंदू महासभा के उम्मीदवार ओमप्रकाश को पराजित किया। लेकिन 1967 में जनसंघ के जेआर जोशी ने मैमूना सुल्तान को पराजित कर दिया। 
दो बार राज्यसभा में
मैमूना मध्य प्रदेश कांग्रेस की सम्मानित नेता थीं। लोकसभा के बाद कांग्रेस पार्टी ने उन्हें बाद में दो बार राज्यसभा में भी भेजा। वे 1974 और फिर 1980 में उच्च सदन के लिए चुनीं गईं। सन 2006 में जब उनकी मृत्यु हुई तो मध्य प्रदेश विधानसभा में सभी दलों के लोगों ने उनके कार्यों को याद किया। अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे फायर ब्रिगेड मार्ग, फतेहगढ़ भोपाल में रहती थीं।
सफरनामा
1932 में मैमूना सुल्तान का जन्म हुआ।
1957 और 1962 में लोकसभा का चुनाव जीता।
1974 और 1980 में राज्यसभा की सदस्य चुनीं गईं
2006 में भोपाल में उनकी मृत्यु हुई।


Saturday, 6 April 2019

पार्वती कृष्णनन- राजसी ठाठ छोड़ मजदूरों की हमदर्द बनीं


(महिला सांसद 24) पार्वती कृष्णनन स्वतंत्रता के बाद देश में साम्यवादी आंदोलन का प्रमुख चेहरा थीं। उनकी पहचान एक बड़े ट्रेड यूनियन लीडर के तौर पर थी। तमिलनाडु के एक अत्यंत अमीर परिवार में जन्मी पार्वती ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई के बाद राजसी ठाठ और ऐशो-आराम की जिंदगी त्याग दिया और गरीबों और मजदूरों की हमदर्द बन गईं।
कोयंबटूर से तीन बार सांसद
पार्वती कृष्णनन ने 1957 में दूसरी लोकसभा का चुनाव तमिलनाडु को कोयंबटूर से कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर जीता। उन्होंने 1974 में कोयंबटूर से उप चुनाव जीता। एक बार फिर वे 1977 में कोयंबटूर से ही लोकसभा के लिए चुनीं गईं। एक बार वे उच्च सदन राज्यसभा के लिए भी चुनी गईं। हालांकि वे 1952 का उपचुनाव हार गईं थीं। बाद में वे 1962, 1980 और 1984 में भी लोकसभा का चुनाव लड़ी थीं पर जीत नहीं मिली।
जब मोरारजी देसाई को माफी मांगनी पड़ी
जनता पार्टी के शासन में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने संसद में महिलाओँ को लेकर कुछ अशोभनीय टिप्पणी की। पार्वती ने उनका तुरंत विरोध किया और मोरारजी देसाई को अपने शब्दों के लिए माफी मांगनी पड़ी।
मद्रास प्रेसिडेंसी के प्रधानमंत्री की बेटी
उनका जन्म 1919 में परमशिवा सुब्बारायन और राधाबाई सुब्बारायन के घर हुआ। उनके पिता मद्रास प्रेसिडेंसी के प्रधानमंत्री थे। स्कूली पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा के लिए वे ऑक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी गईं जहां वे साम्यवादी विचारों के प्रभाव में आईं। उनके पिता के पास 5000 एकड़ जमीन थी जो बाद में उनके परिवार ने भूमिहीनों को दान कर दी।
एक भाई केंद्रीय मंत्री तो दूसरे सेना प्रमुख
लंदन में पढ़ाई के दौरान वे कम्युनिस्ट आंदोलन में सक्रिय हुईं। इसी दौरान उनकी एन कृष्णन से मुलाकात हुई जो बाद में उनके जीवनसाथी बने। उनके पति जाने माने ट्रेड यूनियन लीडर थे जो 1970 में राज्यसभा के सदस्य भी बने। पार्वती कृष्णन के एक भाई मोहन कुमार मंगलम कांग्रेस पार्टी के नेता थे जो इंदिरा गांधी के कैबिनेट में केंद्रीय मंत्री भी बने। उनके बड़े  भाई गोपाल कुमार मंगलम कोल इंडिया के चेयरमैन बने। उनके एक और भाई जनरल परमासिव प्रभाकर कुमारमंगलम भारतीय सेना के सातवें प्रमुख बने।

नब्बे साल की उम्र में भी खूब सक्रिय रहीं
पार्वती कृष्णनन अपने जीवन के आखिरी दिनों में भी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहीं। 90 साल की उम्र के बाद भी कोयंबटूर में रोज लोगों से मिलती थीं। उन्होंने फूलों से काफी लगाव था। खाने पीने की शौकीन पार्वती रसोई घर में खाना पकाने के लिए भी समय निकाल लेती थीं। उनका निधन 94 साल की उम्र में 2014 में हुआ। उनकी एक बेटी हैं जो अमेरिका में डॉक्टर हैं।

सफरनामा
1919 में 15 मार्च को उटी में जन्म हुआ।
1949 से 1952 तक अंडरग्राउंड रहकर काम किया।
1942 में एनके कृष्णन के संग उनका विवाह हुआ।
1954 में राज्यसभा के लिए चुनी गईं।
1957, 1974 और 1977 में लोकसभा का चुनाव जीता।
2014 में 20 फरवरी को कोयंबटूर में मृत्यु हो गई।


Friday, 5 April 2019

वेद कुमारी - तेलुगू भाषी सांसद को हिंदी से खास लगाव था


(महिला सांसद 23 ) - कुमारी मोथी वेद कुमारी आंध्र प्रदेश से पहली बार जीत कर लोकसभा में पहुंची तीन महिला सांसदों में से एक थीं। वे दूसरी लोकसभा के चुनाव में 1957 में एल्लुरु से जीतकर संसद में पहुंची। तेलुगू भाषी वेद कुमारी को हिंदी भाषा से काफी लगाव था। वे शास्त्रीय संगीत की मर्मज्ञ और बेबाक जिंदगी जीने वाली महिला थीं। उन्होंने हमेशा सामाजिक वर्जनाओं का विरोध किया। हालांकि 1962 में दुबारा चुनाव लड़ीं पर इस बार उन्हें जीत नहीं मिल सकी।
महिला शिक्षा पर जोर
वेद कुमारी की समाजसेवा में रुचि थी। वे आंध्र युवती मंडली की अध्यक्ष चुनी गईं थी। उन्होंने महिलाओं के सशक्तिकरण को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। महिलाओं के लिए हिंदी भाषा, टाइपराइटिंग और टेलरिंग सीखाने के लिए एक संस्थान भी खोला था। उन्हें उपन्यास पढ़ने का काफी शौक था। इसके अलावा आंतरिक सज्जा और प्राकृतिक नजारों की फोटोग्राफी में भी उनकी गहरी रूचि थी।
विवाह का विरोध
आंध्र प्रदेश के एल्लुरू में जन्मी मोथी वेद कुमारी के पिता मोथी नारायण राव व्यापारी थे जो स्वतंत्रता सेनानियों की मदद किया करते थे। वे एक वैश्य परिवार से आती थीं पर उन्होंने ब्राह्मण युवक से प्रेम विवाह किया। तब उस विवाह का काफी विरोध हुआ था। पर सामाजिक विरोध को किनारा करते हुए वे अपने पति के साथ अमेरिका चली गईं।
छात्र जीवन से राजनीति में
छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय हो गई थीं। उन्होंने अर्थशास्त्र में एमए की वे छात्र कांग्रेस की सचिव चुनीं गई थीं। उसके बाद वे ऑल इंडिया वूमेन कान्फ्रेंस की वेस्ट गोदावरी ब्रांच की सचिव चुनीं गईं। सन 1957 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक महिला उम्मीदवार विमला देवी को पराजित किया था।
1962 में दूसरा चुनाव हारने के बाद वे पति के साथ अमेरिका चली गईं। कुछ सालों बाद अमेरिका से वापसी के बाद वे एक बार फिर राजनीति में सक्रिय होना चाहती थीं, पर ऐसा नहीं हो सका। पर वे सामाजिक कार्यों में काफी सक्रिय रहीं। उन्होंने दो बच्चों को गोद लिया था।

कर्नाटक संगीत की गायिका
वेद कुमारी की शास्त्रीय संगीत में गहरी रूचि थी। उन्होंने औपचारिक तौर पर संगीत की शिक्षा ली थी। वे कर्नाटक संगीत की बेहतरीन गायिका भी थीं। आकाशवाणी की वे प्रथम श्रेणी की आर्टिस्ट थी। संगीत से उनका जुड़ाव जीवन पर्यंत बना रहा।  
सफरनामा
1931 में 24 सितंबर को उनका जन्म एल्लुरू में हुआ।
1957 में एल्लुरू से लोकसभा का चुनाव जीता
1962 में वे अपना दूसरा चुनाव हार गईं।
1977 में कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई।


Thursday, 4 April 2019

मोफिदा अहमद - पूर्वोत्तर की पहली मुस्लिम महिला सांसद


(महिला सांसद 22 ) 
मोफिदा अहमद 1957 में दूसरी लोकसभा में असम के जोरहाट से चुनाव जीतकर पहुंची। वह संसद में असम की पहली मुस्लिम महिला सदस्य थीं। वे समाजसेविका के साथ ही असमिया की सम्मानित लेखिका भी थीं। वे पूर्वोत्तर के उन मुस्लिम महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने पर्दा प्रथा को चुनौती देते हुए राष्ट्रवादी राजनीति की मुख्यधारा में शिरकत की।

मोफिदा का जन्म जोरहाट शहर में हुआ था। उनके पिता बौरा अली शहर के सम्मानित व्यक्ति थे। उनकी शुरुआती शिक्षा घर में ही हुई। वे उच्च शिक्षा के लिए किसी कॉलेज में नहीं गईं, पर स्वाध्याय से विदूषी महिला बनीं। मोफदिया असमिया साहित्य की सम्मानित लेखिका थीं। उन्होंने आठ पुस्तकों की रचना की। वे खास तौर पर लघुकथाएं लिखती थीं।
रेडक्रॉस से जुड़ कर समाज सेवा
मोफिदा का 1940 में असनद्दीन अहमद से विवाह हुआ। परंपरागत मुस्लिम परिवार से आने वाली मोफदिया विवाह के बाद सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हुईं। वे 1946 में जोरहाट की रेडक्रॉस सोसाइटी से जुड़ कर समाजसेवा करने लगीं। वे रेडक्रॉस सोसाइटी की संयुक्त सचिव बनीं। वे 1951 मे तेजपुर महिला समिति की पदाधिकारी बनीं। अत्यंत गरीब महिलाओं के कल्याण के लिए उन्होंने काम किया। कामकाजी गर्भवती महिलाओं के लिए कल्याण के लिए भी उन्होंने प्रयास किए।
लोकसभा की जंग में
समाज सेवा के बाद वे कांग्रेस पार्टी में सक्रिय हुईं। वे 1953 में गोलाघाट कांग्रेस के महिला विभाग की संयोजक बनाई गईं। सांसद बनने से पूर्व उन्होंने राष्ट्रीय बचत योजना के लिए दो वर्षों तक काम किया। सन 1957 में दूसरे लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया। अपने निकटम प्रतिद्वंद्वी सैयद अब्दुल मल्लिक को उन्होंने 47 हजार से ज्यादा मतों से पराजित किया। मोफदिया अहमद को 80 हजार मत मिले जबकि मल्लिक को महज 33 मत ही मिले।
गांधी और नेहरु पर किताब लिखी
मोफिदा तीसरी लोकसभा में 1962 और छठी लोकसभा में 1971 में भी कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ीं पर उन्हें सफलता नहीं मिल सकी। पर संसदीय पारी खत्म होने के बाद वे लेखन में सक्रिय रहीं। मोफिदा अहमद गांधी और नेहरु के विचारों से काफी प्रभावित थीं। उन्होंने असमिया में दो पुस्तकें लिखीं बिशवदीप बापूजी और भारतार नेहरु। उन्होंने खाली समय में बागवानी का शौक था। वे सिलाई, कढ़ाई और बुनाई का भी शौक रखती थीं।
मुस्लिम वूमेन फोरम ने 2018 में उन्हें बीसवीं सदी की 21 ऐसी महिलाओं की सूची में शामिल किया जिन्होंने सामाजिक गतिरोधों को तोड़कर समाज को बदलने का काम किया। फोरम ने उनपर एक प्रदर्शनी का आयोजन किया था।   
सफरनामा
1921 में नवंबर में उनका जन्म जोरहाट में हुआ।
1940 में 11 दिसंबर को उनका विवाह हुआ।
1957 में दूसरी लोकसभा के लिए चुनी गईं।
1908 मे 17 जनवरी को उनका निधन हो गया।


Wednesday, 3 April 2019

सत्यभामा देवी- भूदान में 500 बीघे जमीन दान में दी


( महिला सांसद 21 ) 
सत्यभामा देवी बिहार से दो बार चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंची। वे उन सांसदों में थी जिन्होंने भूदान आंदोलन के दौरान अपनी 500 बीघे जमीन गरीबों के लिए दान में दे दी। अपने संसदीय काल में उन्होंने हरिजनों, गरीबों और महिला कल्याण के लिए भी काम किया।
दो  बार संसद में
सन 1957 में नवादा के लोकसभा सीट बनने के साथ ही कांग्रेस की सत्यभामा देवी पहली महिला सांसद बनीं। सत्यभामा देवी ने 1962 में अपना लोकसभा क्षेत्र बदल लिया क्योंकि तब नवादा सुरक्षित क्षेत्र हो गया था। इस बार उन्होंने जहानाबाद लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता। अपने दूसरे चुनाव उन्होंने टिकारी के राजपरिवार से आने वाले चंद्रशेखर सिंह को 35 हजार मतों से पराजित किया था।
किसान परिवार में जन्म
सत्यभामा देवी जन्म मार्च 1911 में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री हरि सिंह था। वे बड़हिया गांव की रहने वाली थीं। उनका विवाह गया जिले के एक बड़े किसान और राजनीतिक कार्यकर्ता त्रिवेणी प्रसाद सिंह से हुआ। तब बिहार के परंपरागत किसान परिवार की महिलाएं राजनीति में सक्रिय नहीं होती थीं। पर उन्होंने विवाह के बाद पर्दा प्रथा को नकारते हुए राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया।
हरिजन उत्थान में सक्रिय
सत्यभामा देवी ने स्वतंत्रता के बाद आचार्य विनोबा भावे द्वारा चलाए गए भूदान आंदोलन में सक्रियता निभाई। उन्होंने अपनी 500 बीघा जमीन भूदान के अंतर्गत गरीबों को दान में दे दी थी। इसके साथ उन्होंने दूसरे लोगों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। इसके अलावा उन्होंने चैरिटेबल अस्पताल के लिए जमीन भी दान में दी थी। उन्होंने अपने इलाके में हरिजनों के उत्थान के लिए बहुत काम किया था।
महिला कल्याण में रुचि
सत्यभामा देवी बिहार में महिला कल्याण बोर्ड की सदस्य भी रहीं थीं और महिलाओं के लिए उन्होंने काफी काम किया। उन्होंने अपने जीवन काल में स्त्री शिक्षा पर काफी जोर दिया था। उन्हें बच्चों के साथ समय बिताना और घरेलू कामकाज में बहुत मन लगता था।

अपनी संसदीय पारी खत्म होने के बाद भी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहीं। इसके बाद का समय उन्होंने गया जिले में मंझवे गांव में ही बिताया। वे एक जमींदार परिवार से आती थीं, पर उनकी सादगी के लिए क्षेत्र के लोग उन्हें आज भी याद करते हैं।
सफरनामा
1911 में 14 मार्च को बिहार के किसान परिवार में जन्म हुआ।
1957 में पहली बार नवादा चुनाव जीता।
1962 में जहानाबाद से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंची।
10 साल तक लोकसभा की सदस्य रहीं।


Tuesday, 2 April 2019

बोनिली खोंगमेन - पूर्वोत्तर की पहली महिला सांसद


( महिला सांसद 20 ) 
मेघालय के जनजातीय समाज की आवाज बनीं
पहली लोकसभा में पूर्वोंत्तर से चुनाव जीत कर एकमात्र महिला सांसद पहुंची थी, उनका नाम था बोनिली खोंगमेन। वे जनजातीय समाज की आवाज और जानीमानी शिक्षाविद थीं। मेघालय के जनजातीय लोगों के उत्थान के लिए कई स्कूल खोल कर शिक्षा की ज्योति जगाने के लिए उन्हें याद किया जाता है। वे 1952 में कांग्रेस पार्टी से असम आटोनमस डिस्ट्रिक के अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीट से निर्वाचित हुई थीं। अब वह इलाका मेघालय राज्य बन चुका है।
लंबे समय तक अध्यापन किया
बोनेली की स्कूली पढ़ाई वेल्स मिशन गर्ल्स हाई स्कूल शिलांग में हुई। उच्च शिक्षा उन्होंने कोलकाता में ग्रहण की। राजनीति में आने से पहले वे शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय थीं। वे 1932-33 में असम को गोलाघाट में गर्ल्स स्कूल की प्रधानाध्यापिका बनीं। इसके बाद 1935 से 1940 तक शिलांग के असम गर्ल्स स्कूल की प्रिंसिपल बनीं। इसके बाद 1940 से 1946 के बीच लेडी रेड स्कूल शिलांग में अध्यापन करने लगीं। इसी दौरान वे राजनीति में सक्रिय हुईं।
असम विधान सभा में
बोनिली 1946 में असम विधानसभा के लिए चुनीं गईं। वे विधानसभा की उपसभापति भी चुनीं गईं। इस दौरान वे असम की राजनीति में खूब सक्रिय रहीं। वे खासी जयंतिया नेशनल कान्फ्रेंस की वाइस प्रेसिडेंट बनीं और मेघालय के आदिवासी समाज के लोगों के हक के लिए आवाज उठाई। वे खासी और जयंतिया हिल्स की आदिवासी समाज की सलाहकार परिषद की भी सदस्य रहीं।
मेघालय में कई स्कूल खोले
बोनिली इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की सदस्य रहीं। उन्होंने मेघालय में कई स्कूलों की स्थापना की। उनके परिवार में चार बेटे और एक बेटी थी। खासतौर पर आदिवासी समाज के बड़ी समाजसेविका के तौर पर उन्हें याद किया जाता है।
अपने खाली समय में वे कपड़े बुनती थीं। उन्होंने शरणार्थियों के लिए कपड़े बनाने और उनके बीच वितरीत करने में भी सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें संगीत में वायलिन बजाना पसंद था। अवकाश प्राप्ति के बाद उनका समय मेघालय की राजधानी शिलांग में गुजरा। नब्बे साल की उम्र के बाद उनका स्मृति लोप की बीमारी हो गई थी।
सफरनामा
1912 में 25 जून को जोवाई (जयंतिया हिल्स) में उनका जन्म हुआ।
1934 में उनका विवाह बीएल खोंगमेन से हुआ।
1946 में असम विधानसभा की उपसभापति चुनीं गईं।
1953 में संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सम्मेलन में हिस्सा लिया।
1957 में असम पब्लिक सर्विस कमिशन की चेयरपर्सन बनीं।
1963 से 1970 तक यूपीएससी की सदस्य भी रहीं।
1970 से 1974 तक नगालैंड पब्लिक सर्विस कमिशन की चेयरपर्सन बनीं।
2007 में 18 मार्च को 94 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।


Monday, 1 April 2019

मरगतम चंद्रशेखर - नेहरू से लेकर राजीव के कैबिनेट में मंत्री रहीं


( महिला सांसद - 19 ) मारागतम चंद्रशेखर तमिलनाडु से 1952 में लोकसभा का चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। वे पंडित नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की सरकार में केंद्र में मंत्री रहीं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी उन्हें सम्मान से आंटी कहा करते थे। उन्होंने 1984, 1989 और 1991 का चुनाव श्रीपेरांबदुर से जीता।

1952 में स्वास्थ्य राज्य मंत्री
मरगतम 1952 में नेहरु जी के मंत्रीमंडल में स्वास्थ्य राज्यमंत्री बनाई गईं। वे 1962 से 1964 को गृह राज्यमंत्री रहीं। इसके बाद वे समाज कल्याण मंत्री बनीं। वे 1984 में राजीव गांधी की सरकार में महिला और समाज कल्याण मंत्री बनाई गईं।

कांग्रेस के संगठन में सक्रिय
मरगतम ने कांग्रेस के संगठन में काफी सक्रियता दिखाई। वे तमिलनाडु कांग्रेस का बड़ा नाम थीं। वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव और तमिलनाडु कांग्रेस की अध्यक्ष भी रहीं। वे 1972 में कांग्रेस पार्टी की कोषाध्यक्ष भी रहीं।वे कांग्रेस पार्टी के अनुशासन समिति के अलावा कई और विभागों से भी समय समय पर जुडी रहीं।

लंदन में उच्च शिक्षा
विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई करने के बाद मरगतम उच्च शिक्षा के लिए लंदन गईं। वहां उन्होंने प्रबंधन में पीजी कोर्स किया। उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ जर्नलिज्म से पत्रकारिता में डिप्लोमा भी किया था। इसके साथ ही डोमेस्टिक साइंस में भी प्रशिक्षण कोर्स किया। उनके पति आर चंद्रशेखर भी तमिलनाडु में विधानसभा के सदस्य चुने गए थे।

कई संगठनों में सक्रिय
मरगतम अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग की अध्यक्ष भी रहीं। इसके अलावा उन्होंने भारत सेवक समाज, वाईएमसीए समेत कई संस्थाओं और बोर्डों में अगुवाई कर सामाजिक कार्यों में अपनी सक्रियता दिखाई।

राजीव गांधी की आखिरी रैली
सन 1991 में 21 मई को राजीव गांधी की आखिरी रैली श्रीपेरांबदुर में हुई जिसकी मरगतम चंद्रशेखर आयोजिका थीं। राजीव उनके पक्ष में चुनावी रैली को संबोधित करने आए थे। इसी रैली में पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या हो गई। यहीं से मरगतम ने अपने जीवन का आखिरी चुनाव भी भारी अंतर से जीता था। 

सफरनामा
1917 में 11 नवंबर को चेन्नई में जन्म हुआ।
1952 में तिरुवल्लुर से लोकसभा का पहला चुनाव जीता।
05 बार लोकसभा और 03 बार राज्यसभा की सदस्य रहीं।
1972 में ऑल इंडिया कांग्रेस के सचिव चुनी गईं।
1991 में उन्होंने लोकसभा का आखिरी चुनाव श्रीपेरांबदुर से जीता।
2001 में 19 नवंबर को चेन्नई में निधन हुआ।