Saturday, 18 May 2019

कृष्णा बोस - बंगाल की जानीमानी शिक्षाविद तीन बार संसद में पहुंची


(महिला सांसद-65)
पश्चिम बंगाल की जानी मानी शिक्षाविद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार से आने वाली कृष्णा बोस तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। वाजपेयी के शासनकाल में देश की विदेश नीति निर्धारण में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई।

जादवपुर से तीन बार सांसद
कृष्णा बोस 1996 में पहली बार जादवपुर से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। इसके बाद उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर बारहवीं लोकसभा का 1998 में और तेरहवीं लोकसभा का 1999 में जादवपुर से ही चुनाव जीता। हालांकि वे 2004 का चुनाव सीपीएम के उम्मीदवार से पराजित हो गईं।

40 साल तक अध्यापन
कृष्णा बोस ने बीए करने के बाद कोलकाता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। उन्होंने भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय से संगीत विशारद की भी डिग्री ली। कृष्णा बोस ने सिटी कॉलेज कोलकाता में 40 साल तक अध्यापन किया। वे आठ साल तक इस कॉलेज की प्रिंसिपल भी रहीं।

नेताजी के भतीजे से विवाह
कृष्णा चौधरी (बोस) का जन्म 26 दिसंबर 1930 को ढाका में हुआ था। उनके पिता का नाम चारू सी चौधरी और माता का नाम छाया देवी चौघरी था। जाने माने लेखक नीरद सी चौधरी उनके चाचा थे। उनके पिता संविधान के जानकार और पश्चिम बंगाल विधान सभा के सचिव रहे। कृष्णा बोस का 1955 में 9 दिसंबर को शिशिर कुमार बोस के संग विवाह हुआ। शिशिर बोस नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरत चंद्र बोस के बेटे थे। उनकी तीन संतानें हैं। उनके बेटे सुमंत्रा बोस लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स में प्रोफेसर हैं। उनके बेटे सुगत बोस हार्वार्ड विश्वविद्यालय इतिहास के प्रोफेसर रहे। वे 2014 में जादवपुर से सांसद भी चुने गए।

संसद में खूब सक्रिय
संसद में अपनी तीन कार्यकाल के दौरान कृष्णा बोस काफी सक्रिय रहीं। अपने तीसरे कार्यकाल में वे विदेश मामलों की समिति की चेयरपर्सन रहीं। अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में देश की विदेश नीति के निर्धारण में उनकी प्रमुख भूमिका रही। इसके अलावा मानव संसाधन विकास, सूचना प्रसारण मंत्रालय की समिति समेत कई और संसदीय समितियों की सदस्य रहीं।

महिलाओं और बच्चों के लिए कार्य
सांसद के तौर पर कृष्णा बोस महिला, बाल विकास और द्वियांग के कल्याण के लिए काफी काम किया। वे नेताजी रिसर्च ब्यूरो की अध्यक्ष रहीं। उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर पुस्तक भी लिखी है। कोलकाता में वे विवेक चेतना नामक एनजीओ का संचालन करती हैं जो निर्बल महिलाओं, बच्चों के लिए काम करता है।

 कई पुस्तकें लिखीं
कृष्णा बोस ने अंग्रेजी और बांग्ला में कई पुस्तकें लिखी हैं जिनमें नेताजी की जीवनी प्रमुख है। सन 2008 में उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक एन आउटसाइडर इन पॉलिटिक्स का प्रकाशन पेंगुइन बुक्स ने किया। 2015 में उनकी पुस्तक लॉस्ट एड्रेसेज आई। कई अंग्रेजी और बांग्ला के समाचार पत्रों में नियमित तौर पर लिखती रहीं। वे रेडियो और टेलीविजन कार्यक्रमों में भी नियमित हिस्सा लेती रहीं।

सफरनामा
1930 में 26 दिसंबर को ढाका में जन्म हुआ।

1955 में 9 दिसंबर को शिशिर कुमार बोस के संग विवाह हुआ।

1996 में पहली बार जादवपुर से सांसद चुनीं गईं।

1998 और 1999 में टीएमसी के टिकट पर सांसद चुनीं गईं।

2020 में 22 फरवरी को कोलकाता में निधन। 
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Friday, 17 May 2019

भगवती देवी: पत्थर तोड़ने वाली महादलित महिला बनी सांसद


(महिला सांसद :64)
ग्यारहवीं लोकसभा में 1996 में गया से चुनाव जीत कर संसद में पहुंचने वाली भगवती देवी की कहानी बाकी सांसदों से काफी अलग है। एक पत्थर तोड़ने वाली महादलित महिला संसद में पहुंच गई। न सिर्फ वह सांसद बनीं बल्कि अपने संसदीय जीवन में महिलाओं अधिकारों की आवाज बनीं। लोकसभा विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण दिए जाने के लिए आवाज भी उठाई।
गया से जीता चुनाव
लालू प्रसाद की पार्टी जनता दल ने 1996  में गया (सुरक्षित) सीट से भगवती देवी को लोकसभा की जंग में उतारा। भगवती देवी यहां से जीतकर दिल्ली पहुंच गईं। तब उन्होंने भाजपा के कृष्ण कुमार चौधरी को हराया था। हालांकि1998 में हुए चुनाव में भाजपा उम्मीदवार कृष्ण कुमार चौधरी ने राष्ट्रीय जनता दल उम्मीदवार भगवती देवी को पराजित कर दिया।
1969 में पहली बार विधायक
पत्थर  तोड़कर अपने परिवार का पालन करनेवाली महिला भागवती देवी इससे पहले1969 में बिहार विधानसभा का चुनाव जीत चुकी थीं। पर उन्हें राजनीतिक में लाने का श्रेय दो समाजवादी नेताओं को जाता है। सन 1968में बाराचट्टी की रहनेवाली भागवती देवी जीविकोपार्जन के लिए गया शहर के पास  सड़क पर पत्थर तोड़ रही थीं। भागवती पत्थर तोड़नेवाली अन्य महिलाओं से अपने अधिकारों पर बातें कर रही थीं, उसे सुन सोशलिस्ट नेता उपेंद्र नाथ वर्मा जी रुक गए। वर्मा ने भागवती के बारे में राम मनोहर लोहिया को बताया। लोहिया जी ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से उन्हें टिकट दिया और वे 1969 में बाराचट्टी से जीत कर विधानसभा में पहुंच गईं। वे 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर भी विधानसभा का चुनाव जीतीं।
एक बार फिर राजनीति में
अस्सी के दशक में भगवती एक बार फिर राजनीति से दूर चलीं गई थीं। पर 1995 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने फिर भागवती देवी को बुलाकर टिकट दिया और वह राजद के टिकट पर फिर विधायक बनीं। एक साल बाद जनता दल ने उन्हें लोकसभा गया से लोकसभा की जंग में उतार दिया। कई बार चुनाव जीतने के बाद भी भागवती में कोई गुमान नहीं था। वे बिल्कुल सादगी भरा जीवन जीती थीं।
धरती की बेटी
भगवती देवी के जीवन पर एक पुस्तक आई है धरती की बेटी जिसे राम प्यारे सिंह ने लिखा है। खाली समय में वे सत्संग में हिस्सा लेती थीं। उनकी तीन बेटियां और एक पुत्र हैं। भागवती के बेटे विजय मांझी भी राजनीति में हैं। उनकी बेटी समता देवी 1998 के उप चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनाव में विधायक बनीं।
सफरनामा
1936 में 6 नवंबर को मिथैया ग्राम में जन्म हुआ।
1969 में पहली बार विधायक चुनीं गईं।
1977 में जनता पार्टी के टिकट पर विधायक बनीं
1995 में राजद के टिकट पर विधायक बनीं।
1996 में गया लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुनीं गईं।

Thursday, 16 May 2019

सुभाषिनी अली : निर्बलों और महिलाओं की सशक्त आवाज


(महिला सांसद : 63)
सुभाषिनी अली 1989 में कानपुर से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। सुभाषिनी निर्बल वर्ग और महिला अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करने वाली मानवाधिकार कार्यकर्ता और ट्रेड यूनियन लीडर हैं। बहुमुखी प्रतिभा की धनी सुभाषिनी कई फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा भी मनवा चुकी हैं।
कानपुर से संसद में पहुंची
सुभाषिनी अली ने 1989 में कानपुर नगर से लोकसभा का चुनाव सीपीएम के टिकट पर लड़ा और भाजपा के जगतवीर सिंह द्रोण को 56 हजार मतों से पराजित किया। 1991 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें सुभाषिनी को हार मिली। इसके बाद वे कानपुर से 1996 में भी पराजित हुईं। साल 2014 में उन्होंने बंगाल के बैरकपुर से लोकसभा का चुनाव लड़ा पर वहां भी जीत नहीं मिली।
कैप्टन लक्ष्मी सहगल की बेटी
सुभाषिनी आजाद हिन्द फौज की कैप्टन रहीं डॉक्टर लक्ष्मी सहगल की बेटी हैं। उनकी नानी तमिलनाडु अम्मू स्वामीनाथन भी पहली लोकसभा की सदस्य थीं। सुभाषिनी का जन्म कोलकाता में 29 दिसंबर 1947 को हुआ था। पिता कर्नल प्रेम सहगल और मां लक्ष्मी सहगल आजादी के बाद कानपुर आ गए। उनकी पढ़ाई वेलहेम्स गर्ल हाईस्कूल उत्तराखंड और वूमेन क्रिश्चियन कॉलेज, चेन्नई में हुई।उन्होंने कानपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई की।
निर्बल महिलाओं की आवाज बनीं
सुभाषिनी अली ने भले ही संसद का चुनाव दुबारा नहीं जीता पर वे महिलाओं और किसानों और निर्बल लोगों को हक के लिए लगातार आवाज उठाती रहती हैं। सुभाषिनी के संघर्ष से कई बार सरकारें हिल गईं। दलित शोषण मुक्ति मंच बनाकर उन्होंने बलात्कार, एसिड अटैक, घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिलाया। अपने संगठन के बल पर उन्होंने ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं की आवाज सरकार तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया।
सुभाषिनी माकपा के महिला संगठन अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की उपाअध्यक्ष हैं। वे माकपा पोलित ब्यूरो की भी सदस्य हैं। वृंदा करात के बाद वे माकपा पोलित ब्यूरो की दूसरी महिला सदस्य हैं।
नेता के साथ अभिनेत्री भी
सुभाषिनी अली की शादी मशहूर फिल्म निर्माता मुजफ्फर अली से हुई थी। सुभाषिनी नेता होने के साथ एक बेहतरीन कलाकार भी हैं। सुभाषिनी ने ‘अशोका’, ‘गुरु’, ‘आमू’ जैसी बॉलीवुड फिल्मों में अभिनय भी किया है। उन्होंने साल 2001 में आई फिल्म अशोका में शाहरुख खान की मां को रोल निभाया था। फिल्म उमराव जान में महिला पात्रों के कॉस्ट्यूम सुभाषिनी ने ही डिजाइन किए थे। सुभाषिनी अच्छी वक्ता हैं और समाचार पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिखती भी हैं। वे सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं। उनके बेटे शाद अली जाने माने फिल्मकार हैं।
सफरनामा
1947 में 29 दिसंबर को कोलकाता में जन्म हुआ।
1981 में आई फिल्म उमराव जान का कास्ट्यूम डिजाइन किया।
1989 में कानपुर से लोकसभा का चुनाव जीता।
2014 में बैरकपुर से लोकसभा का चुनाव हार गईं।
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Wednesday, 15 May 2019

प्रमिला दंडवते ताउम्र महिलाओं की आवाज बनीं रहीं


(महिला सांसद: 62)
समाजवादी नेत्री प्रमिला दंडवते सातवीं लोकसभा का चुनाव जीत कर 1980 में संसद में पहुंची। जीवन भर आम आदमी और महिलाओं के हक में आवाज उठाने वाली प्रमिला बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं। वे अच्छी पेंटर और डांसर भी थीं। अपने संगठन महिला दक्षता समिति के माध्यम से वे महिलाओं की आवाज बनकर उभरीं। संसद और विधानसभा में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के लिए उन्होंने प्रमुखता से आवाज उठाई।  
मुंबई से सासंद
प्रमिला प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ कर समाजसेवा और राजनीति में आईं। वे 1968 में मुंबई नगर निगम की सदस्य चुनीं गईं। बाद में जनता पार्टी में शामिल हो गईं। सन 1980 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने उन्हें मुंबई नार्थ सेंट्रल लोकसभा से टिकट दिया। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के वसंत राव होसिंग को कड़े मुकाबले में पराजित किया। हालांकि वे 1984 का चुनाव इसी लोकसभा से हार गईं।
जेजे स्कूल ऑफ आर्ट की स्नातक
प्रमिला का जन्म 1928 मे 27 अगस्त को हुआ। उनके पिता का नाम डाक्टर जनार्दन और माता का नाम लक्ष्मीबाई कारांदे था। उनके पिता जाने माने ग्यानोक्लॉजिस्ट थे। उनका अस्पताल गिरगांव चौपाटी पर था। प्रमिला बचपन में एमआर जयकर द्वारा स्थापित संगठन स्वास्तिक लीग से जुड़ी थीं। प्रमिला को बचपन से पेंटिंग का शौक था। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वे पढ़ाई के लिए मुंबई छोड़कर सिंधुदुर्ग जिले में चली गईं। स्कूली जीवन में राष्ट्र सेवा दल से जुड़ गईं। उनकी आगे की पढ़ाई सोफिया कॉलेज और जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में हुई।
भूदान आंदोलन के लिए पोस्टर बनाए
प्रमिला ने विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को प्रेरित करने के लिए कुछ पोस्टर बनाए। उनके पोस्टर बड़े चर्चित हुए और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। बाद में उन्होंने कला शिक्षक के तौर पर पढ़ाया भी। प्रमिला दंडवते ने समाजवादी नेत्री मृणाल गोरे और अहिल्या रांगनेकर के साथ मिलकर मुंबई में आम लोगों के अधिकारों के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। महाराष्ट्र में उनकी तिकड़ी काफी मशहूर हुई।
मधु दंडवते से विवाह
प्रमिला का विवाह 1953 में जाने माने समाजवादी नेता मधु दंडवते से हुआ। पांच बार सांसद रहे मधु दंडवते मोरारजी देसाई के मंत्रीमंडल में रेलमंत्री और वीपी सिंह सरकार में वित्त मंत्री रहे। प्रमिला पति के साथ समाजवादी आंदोलन में सक्रिय रहीं। वे 1975 में इमरजेंसी के दौरान पुणे के यरवडा जेल में भी बंद रहीं। वे जन अधिकारों के संगठन पीयूसीएल के संस्थापकों में शामिल थीं।  
महिला आरक्षण की वकालत
प्रमिला दंडवते ने 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के दौरान महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण के लिए मांग पत्र सौंपा। प्रमिला दंडवते पेंटर के साथ अच्छी डांसर भी थीं। वे गोवा मुक्ति आंदोलन और संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में भी सक्रिय रहीं। 1965 में सोशलिस्ट यूथ कान्फ्रेंस में हिस्सा लेने स्वीडन गई थीं। 1975 से 1977 के दौरान उन्होंने इमरजेंसी का जोरदार विरोध किया था। साल 2001 की 31 दिसंबर को वे इस दुनिया को छोड़कर चली गईं।

सफरनामा
1928 में 27 अगस्त को उनका जन्म हुआ।
1951 में जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स से कला स्नातक की डिग्री।
1953 में समाजवादी नेता मधु दंडवते से विवाह हुआ।
1968 में मुंबई नगर निगम का चुनाव जीता
1983 से 1993 तक महिला दक्षता समिति की अध्यक्ष रहीं। 
1980 में लोकसभा का चुनाव जीत कर संसद में पहुंची।
2001 में 31 दिसंबर को उनकी मृत्यु हो गई। 
- प्रस्तुति - विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, 14 May 2019

कृष्णा शाही -जब बिहार से एकमात्र सांसद कांग्रेस से जीतीं


( महिला सांसद - 61 ) दसवीं लोकसभा चुनाव के नतीजे जब 1991 में आए तो अविभाजित बिहार की 54 सीटों में से कांग्रेस ने सिर्फ एक सीट पर जीत दर्ज की। भले केंद्र में तब कांग्रेस की सरकार बनी थी पर बिहार में यह पार्टी का बुरा प्रदर्शन था। पर जिस एक सीट पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की वह थी बेगुसराय। जहां कांग्रेस की कृष्णा शाही ने जनता दल के रामबदन राय को 68 हजार मतों से हराया था। कृष्णा शाही बिहार के बेगुसराय लोकसभा क्षेत्र से सर्वाधिक तीन बार सांसद रहीं। वे केंद्र सरकार में राजीव गांधी की सरकार मे कई मंत्रालयों की मंत्री रहीं। वकालत से राजनीति में कदम रखने वाली कृष्णा शाही सांसद बनने से पहले बिहार में कई साल तक विधायक भी रहीं।
बेगुसराय से तीन बार सांसद
कृष्णा शाही ने 1980 में बिहार के बेगुसराय से कांग्रेस आई के टिकट पर सातवीं लोकसभा का चुनाव जीता। बेगुसराय की जंग में उन्होंने दो बार सांसद रहे श्यामनंदन मिश्र को पराजित किया था। वे 1984 में बेगुसराय से समाजवादी नेता कपिलदेव सिंह को पराजित कर संसद में पहुंची। हालांकि वे 1989 का लोकसभा चुनाव जनता दल के ललित विजय सिंह से हार गईं। उन्होंने 1996, 1998 और 2004 में भी बेगुसराय से लोकसभा का चुनाव लड़ा पर जीत नहीं सकीं।   
केंद्र में मंत्री बनीं
कृष्णा शाही राजीव गांधी की सरकार में केंद्र में मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री बनाई गईं। वे राजीव गांधी के मंत्रीमंडल में कुछ समय तक जल संसाधन मंत्री भी रहीं। सांसद रहते हुए उन्हें 1982 में असम पर बनी सलाहकार समिति का सदस्य बनाया गया। वे दहेज उन्मूलन समिति की भी सदस्य रहीं। इसके अलावा भी वे कई समितियों की सदस्य रहीं।
वकालत से राजनीति में
कृष्णा शाही का जन्म 16 फरवरी 1931 को मुजफ्फरपुर में हुआ था। उनके पिता महेश प्रसाद सिंह बिहार के प्रतिष्ठित समाजसेवी और राजनेता थे। उन्होंने बीए (आनर्स) और बीएल की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय और बिहार विश्वविद्यालय से की। कानून की पढ़ाई के बाद वे वकालत के पेश में आईं। वकालत करते हुए उन्होंने समाज सेवा और राजनीति में कदम रखा।
दो बार मोकामा से विधायक
कृष्णा शाही को राजनीति पिता से विरासत में मिली थी। उन्होंने 1972 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पहली बार मोकामा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता। उन्होंने 1977 में दुबारा मोकामा से कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की। सन 2004 के बाद उन्होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा। उनकी एक बहन उषा सिन्हा भी 1989 में वैशाली से सांसद चुनीं गई थीं। उषा सिन्हा केंद्र सरकार मे मंत्री भी रहीं। वे इन दिनों गाजियाबाद में रहती हैं।
सफरनामा
1931 में 16 फरवरी को मुजफ्फरपुर में जन्म हुआ।
1946 में 16 मई को बीपीएन शाही के संग विवाह हुआ।
1972 में बिहार विधानसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1980 में पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता।
1984 और 1991 में भी लोकसभा का चुनाव जीता।


Monday, 13 May 2019

राजेंद्र कुमारी वाजपेयी - सीतापुर से लगातार तीन बार चुनाव जीता


( महिला सांसद 60 ) राजेंद्र कुमारी वाजपेयी उत्तर प्रदेश के सीतापुर से लगातार तीन बार लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंचीं। उन्होंने 1980 के बाद 1984 और 1989 में लगातार यहां से लोकसभा का चुनाव जीता। उत्तर प्रदेश की राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद वे केंद्र की राजनीति में पहुंची। वे केंद्र सरकार में मंत्री भी रहीं, वे पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के करीबी नेताओं में गिनी जाती थीं।
बिहार के भागलपुर में जन्म
राजेंद्र कुमारी वाजपेयी का जन्म 1925 में बिहार के भागलपुर के लालूचक ग्राम में पंडित एसके मिश्रा के घर में हुआ था। वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे रविशंकर शुक्ला की नतिनी थीं। छात्र जीवन में उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए और पीएचडी तक पढ़ाई की। इसके बाद कालेज में अध्यापन करने लगीं। उनका विवाह डीएन वाजपेयी के संग हुआ। उनके बेटे अशोक वाजपेयी हैं और एक बेटी मनीषा द्विवेदी हैं।
यूपी सरकार में मंत्री
राजेंद्र कुमारी वाजयेपी 1959 में इलाहाबाद नगर निगम की सदस्य बनीं। इसके बाद 1962 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनीं गईं। वे 1977 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य रहीं। वे 1970 से 1977 के बीच उत्तर प्रदेश सरकार में कई विभागों की मंत्री भी रहीं। 1970 में प्रदेश की शिक्षा मंत्री बनाईं गईं। वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष भी रहीं।
केंद्र सरकार में मंत्री
राजेंद्र कुमारी 1984 में राजीव गांधी के नेतृत्व में बनी केंद्र सरकार में समाज कल्याण मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाई गईं। इसके बाद राजीव मंत्रीमंडल में 1986 में वे श्रम मंत्री बनाईं गईं। इसके बाद 1987 से 1989 तक वे फिर समाज कल्याण मंत्री रहीं। सांसद के तौर पर वे कई समितियों की सदस्य रहीं।
पुड्डुचेरी की राज्यपाल
राजेंद्र कुमारी वाजपेयी 2 मई 1995 को पुड्डुचेरी की राज्यपाल बनाई गईं। वे 1998 तक इस पद पर रहीं। खाली समय में उन्हें पढ़ना और संगीत सुनना पसंद था। एक राजनेता के तौर पर सांप्रादायिक सौहार्द बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। राज्यपाल पद से अवकाश के बाद वे प्रयाग राज में रहती थीं। यहीं पर 1999 में 17 जुलाई को उनका निधन हो गया। उनके बेटे अशोक वाजपेयी भी कांग्रेस पार्टी की राजनीति में सक्रिय रहे।

सफरनामा
1925 में 8 फरवरी को भागलपुर में जन्म हुआ।
1962 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनीं गईं।
1980, 1984 और 1989 में सीतापुर से सांसद चुनीं गईं।
1984 में केंद्र में समाज कल्याण मंत्री ( स्वतंत्र प्रभार ) रहीं।
1999 में 17 जुलाई को प्रयाग राज में निधन हो गया।


Sunday, 12 May 2019

गीता मुखर्जी- बंगाल से लगातार सात बार सांसद चुनीं गईं


( महिला सांसद -59 ) गीता मुखर्जी वामपंथी आंदोलन और नारी सशक्तिकरण का सशक्त चेहरा थीं। पश्चिम बंगाल से सात बार लोकसभा में पहुंचने वाली गीता मुखर्जी लोकसभा की दमदार आवाज थीं। वे 1980 में पहली बार बंगाल के पनसुकरा से लोकसभा की सदस्य चुनीं गईं। आंदोलनकारी सांसद होने के साथ ही गीता मुखर्जी गहरी साहित्यिक अभिरुचि वाली महिला थीं।
पनसुकरा में अपराजेय रहीं
गीता मुखर्जी ने 1984, 1989, 1991, 1996, 1998 और 1999 का लोकसभा चुनाव भी मिदनापुर जिले की पनसुकरा लोकसभा क्षेत्र से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर जीता। इससे पहले गीता मुखर्जी पश्चिम बंगाल की विधानसभा में रह चुकी थीं। वे पहली बार 1967 में पनसुकरा पूर्व से विधायक चुनीं गई। फिर 1972 में भी पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए चुनीं गईं।
स्वतंत्रता आंदोलन में जेल गईं
गीता मुखर्जी का जन्म 8 जनवरी 1924 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने बांग्ला साहित्य में स्नातक की पढ़ाई आशुतोष कॉलेज कोलकाता से की। सन 1942 में उनका विवाह वामपंथी नेता विश्वनाथ मुखर्जी के संग हुआ। वे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और उसके बाद भी कई बार जेल गईं।
15 साल की उम्र में छात्र राजनीति में
गीता महज 15 साल की उम्र में आशुतोष कॉलेज कोलकाता में अध्ययन के दौरान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन में सक्रिय हो गईं थी। वे बंगाल प्रांत छात्र संगठन की 1947 से 1951 तक सचिव रहीं। वे 1946 में सीपीआई की राज्य समिति की सदस्य बन गई थीं। 1981 के बाद वे लगातार सीपीआई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य रहीं।
कई पुस्तकें लिखी
गीता मुखर्जी की साहित्य में काफी रूचि थी। उन्होंने बांग्ला में भारत उपकथा, छोटोदेर रविंद्रनाथ और हे अतिथि कथा कहो जैसी पुस्तकों की रचना की।उन्होंने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी से बांग्ला में अनुवाद भी किया। गीता मुखर्जी अपने जीवन के आखिरी क्षण तक संसद के अंदर और बाहर सक्रिय रहीं। सन 2000 में 4 मार्च को 76 साल की उम्र में जब वे एक कार्यक्रम में अलीगढ़ जाने की तैयारी कर रही थीं, उनका नई दिल्ली में निधन हो गया।
संसद में महिला आरक्षण की हिमायत
महिलाओं को संसद और राज्य के विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण दिए जाने वाले विधेयक के लिए वे सक्रियता से हिमायत करती रहीं। इस बिल के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति की वे चेयरपर्सन थीं। इस बिल को लेकर उनकासमर्पण इतना ज्यादा था कि ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने गुजराल सरकार में मंत्री पदसिर्फ इसीलिए ठुकरा दिया कि वह बिल पर पूरा फोकस करना चाहती थीं। सांसद बनने के दौरान वे कई संसदीय समितियों से जुडी रहीं। वे नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वूमेन की उपाध्यक्ष और अध्यक्ष रहीं। वे वूमेन इंटरनेशनल डेमोक्रेटिक फेडरेशन बर्लिन की सदस्य रहीं।  
सफरनामा
1924 मे 8 जनवरी को उनका जन्म हुआ।
1967 में पहली बार विधानसभा का चुनाव जीता।
1980 में बंगाल के पनसुकरा से लोकसभा का चुनाव जीता।
1999 में सातवीं बार पनसुकरा से लोकसभा का चुनाव जीता।
2000 में 4 मार्च को नई दिल्ली में निधन हो गया।


Saturday, 11 May 2019

रानो एम शाइजा - नगालैंड की पहली महिला सांसद- राज्य में शराबबंदी कराई

( महिला सांसद- 58  ) रानो एम शाइजा नगालैंड ने लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंचने वाली पहली महिला सांसद थीं। सन 1977 के चुनाव में उन्होंने नगालैंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार होकिसे सीमा को पराजित किया था। रानो यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार थीं। नगालैंड में शांति बहाली में उन्होंने काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें नगालैंड में पूर्ण शराबबंदी कराने के लिए भी याद किया जाता है।
पढाई के बाद टीचर की नौकरी
नगालैंड में महिलाएं भले ही मुखर हैं पर राजनीति में उनकी भागीदारी बिल्कुल नहीं रही है। शाइजा इसकी अपवाद रहीं। शाइजा का जन्म अंगामी नागा परिवार में नगालैंड के फेक जिले में 11 नवंबर 1928 को हुआ था। उनके पिता सेविली इरालू पेशे से डॉक्टर थे। उनकी माता वितुलाई इरालू के भाई अंगामी जापू फिजो नाग सेपरेटिस्ट मूवमेंट के संस्थापक थे। शाइजा की पढ़ाई सेंट मेरीज कॉलेज शिलांग और कॉटेन कॉलेज गुवाहाटी में हुई। पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने स्कूल टीचर के तौर पर नौकरी शुरू की।
19 महीने जेल मे रहीं
शाइजा 1970 के दशक में शिक्षक की नौकरी छोड़कर नगा आंदोलन में शामिल हो गईं। वे नगा नेशनल काउंसिल की वूमेन फेडरेशन की पहली अध्यक्ष चुनीं गईं। इसके बाद वे यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी की पहली महिला अध्यक्ष चुनीं गईं। नगा आंदोलन के दौरान 1960 के दशक में वे 19 महीने तक वे जेल में भी रहीं। शाइजा ने लंगशिम शाइजा से विवाह किया था। उनकी दो बेटियां और एक बेटा है। उनके पति लंगशिम शाइजा की नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड ( एनएससीएन) के लोगों ने 27 जनवरी 1990 को हत्या कर दी।
शांति समझौता कराने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
शाइजा ने नगा शांति समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने आंदोलन के नेता अंगामी जाफू फिजो और तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। शांति समझौते लिए उनकी भूमिका को याद किया जाता है। रानो शाइजा 1980 में भी लोकसभा का चुनाव लड़ी थीं, पर इस बार वे कांग्रेस उम्मीदवार से महज 5 हजार मतों से पराजित हो गईं।
नगालैंड में पूर्ण शराबबंदी कराई
सादगी भरा जीवन जीने वाली शाइजा ने नगालैंड राज्य में पूर्ण शराबबंदी कराने में भी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने नगा मदर्स एसोसिएशन की स्थापना की थी। उनकी संस्था ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी के लिए अवाज उठाई। उनके प्रयासों से ही नगालैंड पूर्ण शराबबंदी अधिनियम 1989 बना। राज्य में 29 मार्च 1990 को शराबबंदी लागू हो गई।
शाइजा अंगामी समुदाय से आती थीं, पर उन्होंने राज्य के दूसरे नगा समुदायो के साथ एकता बनाने की पूरी कोशिश की। शाइजा नगालैंड की राजनीति में एकमात्र महिला चेहरा रहीं। पांच दशक में नगालैंड में कोई महिला विधायक भी नहीं चुनी जा सकी। शाइजा का एक अप्रैल 2015 को 86 साल की उम्र में कोहिमा में निधन हो गया।
सफरनामा
1928 मे 11 नवंबर को जन्म हुआ
1971 में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष चुनीं गईं
1977 में नगालैंड से लोकसभा का चुनाव जीता।
1980 का चुनाव मामूली अंतर से हार गईं।
2015 में एक अप्रैल को उनका निधन हो गया।



Friday, 10 May 2019

मृणाल गोरे - जीवन भर लड़ती रही मुंबई की पानी वाली बाई


( महिला सांसद 57 ) 
मृणाल गोरे का नाम देश की जानीमानी समाजवादी नेत्रियों में शुमार है। वे 1977 में मुंबई उत्तर संसद सदस्य चुनीं गईं। वे एक सभासद, विधायक और सांसद के तौर पर लगातार गरीबों के लिए संघर्ष करती रहीं। मुंबई में पानीवाली बाई के रूप में चर्चित थीं। मृणाल महान महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक थीं और जीवन पर्यंत गरीबों और समाज के वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष करती रहीं।

झुग्गी वालों को पानी का कनेक्शन दिलवाया
महाराष्ट्र में समाजवादी आंदोलन की आखिरी स्तंभ मानी जाने वाली मृणाल ने स्थानीय प्रशासन के साथ लड़ाई लड़कर झुग्गी बस्तियों को पानी का कनेक्शन दिलवाया था। इसके बाद से लोग उन्हें पानीवाली बाई के नाम से पुकारने लगे। वे 1961 में पहली बार स्थानीय निकाय चुनाव लड़ी और जीत हासिल की। वर्ष 1964 में पानी के लिए हुए संघर्ष में 11 लोगों की मौत होने के बाद उन्होंने झुग्गी बस्तियों में पानी की आपूर्ति के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था। वे 1972 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर बड़े अंतर से चुनाव जीतकर विधायक चुनीं गईं।

1977 में मुंबई उत्तर से बड़ी जीत

इमरजेंसी के दौरान 18 महीने तक मृणाल गोरे अंडरग्राउंड रहीं। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में लागू आपातकाल की समाप्ति के बाद वर्ष 1977 में हुए आम चुनाव में मृणाल ने मुंबई उत्तर से भारतीय लोकदल के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था और भारी मतों से निर्वाचित हुईं। उन्हें 65 फीसदी वोट मिले जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को महज 35 फीसदी। उन दिनों महाराष्ट्र में एक नारा प्रचलित हुआ था-पानीवाली बाई दिल्ली में, दिल्लीवाली बाई पानी में।

मंत्री बनने से इनकार किया

मृणाल गोरे लोकसभा में प्रखर वक्ता थीं। मोरारजी सरकार में उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री बनने से इनकार कर दिया क्योंकि वे सत्ता पक्ष में रहकर भी जनता से जुड़े मुद्दे उठाना चाहती थीं। लोकसभा में कार्यवाही के दौरान श्रीमती गोरे ने विभिन्‍न बहसों में जो प्र‍गतिशील विचार व्‍यक्‍त किए उन्‍हें और उनके योगदान को लम्‍बे समय तक याद रखा जाएगा। 

सशक्त विपक्ष की भूमिका में

मृणाल ने विधायक और विधान पार्षद के रूप में वर्षो अपने राज्य की सेवा की थी। 1987 से 1989 के बीच महाराष्ट्र विधानसभा में उन्होंने सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने मुंबई की कीमती जमीन बिल्डरों को दिए जाने का विरोध किया। उन्होंने जन्म से पूर्व लिंग परीक्षण के खिलाफ आंदोलन चलाया था जिसपर सरकार ने 1986 में कानून बनाया। महाराष्ट्र में उन्होंने अहिल्या दांडेकर और प्रमिला दंडवते के साथ मिलकर कई आंदोलनों का नेतृत्व किया।

गरीबों की सेवा के लिए डॉक्टरी छोड़ी

सन 1928 में 24 जून को मृणाल मोहिले का जन्म एक मराठी कायस्थ परिवार में हुआ। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही वे कांग्रेस के सहयोगी संगठन राष्ट्रीय सेवा दल में शामिल हो गईं। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता केशव गोरे संग अंतरजातीय विवाह कर मिसाल पेश की। गरीबों और दबे कुचले लोगें की सेवा के लिए डॉक्टरी के कैरियर को छोड़ दिया। वे गोवा मुक्ति आंदोलन में भी सक्रिय रहीं। मुंबई के वसई में 17 जुलाई 2012 को 84 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई।

सफरनामा

1928 में 24 जून को उनका जन्म हुआ था।
1948 में मृणाल ने सोशलिस्ट पार्टी की सदस्यता ली।
1972 में सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर मुंबई से विधायक चुनीं गईं।
1977 में मुंबई उत्तर से लोकसभा का चुनाव जीता।
2012 में 17 जुलाई को उनका निधन हो गया।