Saturday, 23 July 2011

रसोई गैस का विकल्प

रसोई गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं। फिलहाल ये 400 रूपये प्रति सिलेंडर से ज्यादा हो गई हैं। वहीं सरकार और सब्सिडी घटाने की योजना रखती है। माना जा रहा है कि एक गैस सिलेंडर की कीमत 800 रूपये पहुंच सकती है। वहीं सरकार आम लोगों को साल में कुछ निश्चित सिलेंडर ही रियायती मूल्य पर देने की योजना लाने वाली है। अगर ये योजना लागू हो जाती है तो एक घरेलू उपभोक्ता को सिर्फ चार सिलेंडर ही रियायती दरों पर मिला करेंगे। उसके बाद बाद के सिलेंडर के लिए बाजार दर यानी 800 रूपये तक देना पड़ सकता है। ऐसे में ये जरूरी हो गया है कि रसोई गैस के दूसरे विकल्पों के बारे में गंभीरता से सोचा जाए। अब कई गांवों तक गैस कनेक्शन पहुंचा दिया गया है। लेकिन गैस पर खत्म होने वाली सब्सिडी का असर सभी जगहों पर पड़ेगा। रसोई गैस की किल्लत से निपटने के लिए गुजरात के कच्छ जिले के गंगापर गांव के लोगों ने अनूठा इंतजाम किया है। इस गांव में गोबर गैस प्लांट की स्थापना की गई है। ये प्लांट गांव के 60 घरों के लोगों को महज 20 रूपये मासिक मासिक पर चार घंटे गैस की सप्लाई दे रही है। गैस की सप्लाई का समय सुबह 10 से 12 बजे और शाम 7 से नौ बजे तक रखा गया है। गोबर गैस प्लांट की स्थापना में 25 लाख रूपये खर्च आया है जिसमें मिनिस्ट्री और नेचुरल रिसोर्सेज ने 90 फीसदी सब्सिडी दी है। ये गैस प्लांट शहर के पीएनजी से मिलता जुलता है। गांव के हर घर को पाइप से गैस की सप्लाई की जा रही है। गांव में बने इस गैस प्लांट से गांव के कई लोगों को रोजगार भी मिल सका है। अमूमन हर गांव में इतने पशु होते हैं जिससे कि गोबर गैस प्लांट की स्थापना की जा सकती है। गुजरात के भुज जिले के इस गांव के माडल को अब दूसरे गांव भी अपना सकत हैं।
वैसे तो गोबर गैस प्लांट लगाने का प्रोजेट बहुत पुराना है। लेकिन गांव में वही लोग अपना स्वतंत्र गोबर गैस प्लांट लगा पाते हैं जिनके पास जानवरों की संख्या 4-6 से ज्यादा हो। लेकिन गांव में कम्यूनिटी गोबर गैस प्लांट लगाने के इस प्रोजेक्ट से पूरे गांव लोगों को फायदा होगा। गुजरात के इस प्रोजेक्ट को देश के उन तमाम गांवों में लागू किया जा सकता है जहां भी लोगों के पास पशु संपदा है। वैसे गांव जहां 50 से अधिक घर हैं ऐसे प्लांट बड़े आराम से लगाए जा सकते हैं। ऐसे प्लांट लगाए जाने से गांव के लोगों लकड़ी और गोबर के उपलों से चलने वाले चूल्हे से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही धुआं रहित रसोई घर में गृहणियां अपनी मनमाफिक खाना बना सकती हैं। गांव में बड़ी संख्या में महिलाएं लकड़ी और उपले पर खाना बनाने के कारण सांस की बीमारियों का शिकार होती हैं उन्हें भी गोबर गैस के चुल्हे के कारण ऐसी बीमारियों से निजात मिल सकती है। साथ ही गांव के लोगों को शहर के गैस सप्लाई की तरह खाना बनाने का एक सस्ता विकल्प मिल सकेगा। जरूरत है तो बस इस प्रोजेक्ट का प्रचार प्रसार करने की।
-    -  विद्युत प्रकाश मौर्य

कैसे करें अपने एटीएम की सुरक्षा


बैंक एटीएम ने कई तरह की सुविधाएं जरूर दी हैं लेकिन एटीम का सावधानी के साथ रखरखाव भी जरूरी है। आजकल भोले भाले लोगों से एटीएम बदल लेने की घटनाएं खूब सुनने में आ रही हैं। ऐसे में जरूरी है कि जब आप एटीएम का इस्तेमाल कर रहे हों तो कुछ खास तरह की सावधानी बरतें.

-    जब भी आप किसी एटीएम में पैसे निकालने के लिए प्रवेश करें तो इस बात का ख्याल रखें कि एटीएम के अंदर आपके अलावा कोई दूसरा नहीं प्रवेश कर रहा हो। अगर कोई आदमी आपके पीछे आ भी गया हो तो उसे बाहर जाने के लिए कहें।
-    जब आप एटीएम का इस्तेमाल कर रहे हों तो इस बात का ख्याल रखें कि पीछे से कोई आपके एटीएम का पासवर्ड तो नहीं देख रहा है।
-    जब आप एटीएम लेकर चल रहे हों तो उसका पासवर्ड किसी डायरी या स्लिप में लिखा हुआ रखकर अपने साथ लेकर नहीं चलें। हमेशा अपने पासवर्ड को याद रखने के बाद उसे नष्ट कर दें।
-    अपने एटीएम के पीछे लिखे सीवीवी नंबर को खुरचकर मिटा दें। और सुविधा के लिए इस सीवीवी नंबर को कहीं घर में लिख कर रखें। इस सीवीवी नंबर से आपका एटीएम चोरी हो जाने पर आन लाइन ट्रांजेक्शन का खतरा रहता है। हालांकि आजकल बैंक आनलाइन ट्रांजेक्शन पर अतिरिक्त सुरक्षा भी दे रहे हैं।
-    अगर आप अपने एटीएम से आन लाइन शापिंग या दुकानों में खरीददारी नहीं करते हों तो अपने एटीएम में वीजा या मास्टर पावर यानी डेबिट कार्ड को एक्टिवेट नहीं कराएं। बैंक अक्सर डेबिट कार्ड के लिए सालाना शुल्क लेते हैं अगर आपको इसकी जरूर नहीं हो तो डेबिट कार्ड सक्रिय ना ही रखें तो अच्छा
-    अगर आपका एटीएम खो जाता हो तुरंत बैंक के 24 घंटे काल सेंटर पर फोन करके एटीएम को ब्लॉक कराएं। जिससे की किसी भी तरह के दुरूपयोग से बचा जा सके।

-    अगर जरूरी नहीं हो तो रोज अपनी जेब में एटीएम लेकर नहीं चलें। एटीएम लेकर तभी चलें जब आपको इसकी जरूरत हो। यानी जिस दिन रूपये निकालने हों उसी दिन अपना एटीएम साथ लेकर चलें बाकि दिनों एटीएम को घर में ही रखें तो अच्छा।

-    खास तौर पर रात में एटीएम लेकर नहीं चलें तो अच्छा। अगर आपके पास कई बैंकों का एटीएम हो तो सिर्फ उसी बैंक का एटीएम लेकर साथ चलें जिसमें कम पैसे रहते हों।

-    अपने एटीएम का पासवर्ड अपने परिवार के सारे लोगों या फिर घर के नौकरों को नहीं बताएं। अगर कभी किसी और से रूपये निकलवाने की जरूरत पड़ जाए तो अगली बार इस्तेमाल से पहले अपने पासवर्ड बदल लें। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य
  

चलो चलें गांव की ओर

साल 2011 के जनगणना के कई आंकड़े सुखद भी हैं। जैसे की देश की कुल आबादी का 70 फीसदी हिस्सा अभी भी गांव में ही रहता है। यानी गांव से शहर की ओर भागने की प्रवृति में कमी आई है। भारत के बारे में हमेशा से कहा जाता है कि ये गांवों का देश है। देश आजाद होने के बाद 80 फीसदी आबादी गांव में बसती थी। लेकिन अभी भी आजादी के 60 साल बाद भी 70 फीसदी लोग गांव में बसते हैं। अब भला गांव में लोगों को जीवन की मूलभुत सुविधाएं मिल जाएं तो शहर की ओर क्यों पलायन करें।

 हवा, पानी मौसम के लिहाज से गांव शहर से बेहतर हैं। अब गांव में टीवी देखने के लिए डाइरेक्ट टू होम और मोबाइल फोन और इंटरनेट जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। अगर गांव में बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्टर यानी बिजली और सड़क जैसी दो मूल सुविधाएं हों तो गांव के लोग शहर की ओर नहीं भागेंगे। गांव में स्कूल की सुविधा पहले से ही है। बिजली और सड़क होने से कई तरह की सुविधाएं अपने आप आ जाती हैं। अब गांव में तमाम बैंकों की शाखाएं और एटीएम तो खुलने ही लगे हैं। अगर हर गांव सड़क से अच्छी तरह जुड़े हों तो शहर के स्कूलों और कालेंजों की बसें गांव गांव पहुंच कर बच्चों को स्कूल ले आती हैं। अगर हम पंजाब जैसे राज्य को देखे जहां हर गांव अच्छी सड़कों से जुडे हुए हैं तो वहां जालंधर और लुधियाना जैसे शहरों के स्कूल और कालेज की बसें गांव से जाकर बच्चों को ले आती हैं। कई बड़े गांवों में तो अच्छे अस्पताल भी हैं। साथ ही कुछ नामचीन स्कूलों ने गांव में भी अपने स्कूल की शाखाएं खोल रखी हैं।

दिल्ली जैसे महानगर में तमाम अवैध कालोनियों में तंग और बदबूदार गलियां हैं,जहां जीवन बहुत मुश्किल है। कई घरों में हवा और धूप भी नहीं पहुंचती। 2011 की जनगणना में ही उत्तर पूर्वी दिल्ली इलाके को सबसे अधिक सघन आबादी वाला इलाका बताया गया है। यानी यहां प्रति वर्ग किलोमीटर में जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक है। अगर जीवन की बात करें तो सेहत के लिहाज से यहां का जीवन लोगों को बीमार करने वाला है। तो इससे तो कई गुना अच्छी गांव की ही जिंदगी है। अब की शहर भला रूख लोग करते ही क्यों हैं. जाहिर सी बात है रोजी रोटी की तलाश में शहर की पलायन करना पड़ता है. लेकिन अगर गांव में रोजगार के कुछ मौके बढ़ जाएं तो शहर की ओर पलायन घट सकता है।

 गांव तक अच्छी सड़कें और बिजली हो तो तमाम तरह के लघु उद्योग जो शहरों में चल रहे हैं उन्हें गांव में भी चलाया जा सकता है। लेकिन विडंबना है कि आजादी के 60 साल बाद भी कई राज्यों के गांव में सड़कों के विकास पर ध्यान नहीं दिया गया। हम 100 फीसदी ग्रामीण विद्युतीकरण से भी अभी कोसों पीछे हैं। सरकारें जितना रूपया शहरों के विकास में फूंक रही उसका आधा हिस्सा भी गांवों के लिए नहीं जा रहा। अगर भारत के सभी गांवों में सिर्फ सड़कें और बिजली पहुंच जाए तो गांव का जीवन निश्चय ही और बेहतर हो सकेगा और शहरों की ओर पलायन में गिरावट आएगी।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, 20 June 2011

हर खरीददारी के लिए खुले ब्रांडेड स्टोर

देश के सबसे बड़े चिकेन उत्पादक रामी रेड्डी की हैदराबाद शहर में हर कोने में चिकेन की ब्रांडेड दुकाने हैं। वहां आप चिकेन खरीदने जाते हैं तो परंपरागत बाजार की तरह कोई बदबू नहीं आती। सीसे के बने सुंदर और भव्य स्टोर से आप 250 ग्राम चिकेन भी खरीद सकते हैं। अन्य जगहों की तुलना में सस्ता और ताजा चिकेन यहां उपलब्ध है। स्टोर सबसे सुस्वादु चिकेन का भी दावा करता है। सिर्फ हैदराबाद शहर में ही उनकी वेनकाब और स्नेहा नाम से 80 से ज्यादा चिकेन स्टोर हैं। इनमें से ज्यादातर कंपनी के स्टोर हैं वहीं कुछ फ्रेंचाइजी भी हैं। यहां इलेक्ट्रानिक वेइंग मशीन और बिलिंग के लिए कंप्यूटर भी उपलब्ध हैं। किसी जमाने मे चिकेन का कारोबार जहां असंगठित तौर पर चलता था वह भी ब्रांडेड चेन सिस्टम में चल रहा है। इससे भले छोटे छोटे चिकेन उत्पादकों के कारोबार को धक्का लगा है। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि चिकेन के कारोबार में बड़ी मछली का साम्राज्य कायम हो चुका है और छोटी मछलियों की अब खैर नहीं। लगभग सभी क्षेत्र में आने वाले दिनों में कुछ ऐसा ही दिखाई देने वाला है। हो सकता है आने वाले कुछ दिनों में सिर्फ हैदराबाद ही नहीं बल्कि देश के अन्य हिस्सों में ही इसी तरह की ब्रांडिंग देखने को मिले।

दवा में भी ब्रांड - दवा के क्षेत्र में हम ओपोलो फार्मेसी का उदाहरण ले सकते हैं। ओपोलो ने हास्पीटल के बाद अब दवा बिक्री के क्षेत्र में कदम रख दिए हैं। ओपोलो फार्मेसी के दवा दुकानों की सबसे पहली विशेषता यह है कि ये 24 घंटे खुली रहती हैं। यानी आप किसी भी समय यहां आप दवाएं खरीद सकते हैं। अपनी ही दुकान से दवा खरीदने को प्रेरित करने के लिए ओपोलो फार्मेसी ने सदस्यता कार्ड की व्यवस्था की है। इसके तहत साल में छह हजार रुपए तक की दवा खरीदने वालों को 500 रुपए के डिस्काउंट की व्यवस्था है। ओपोलो ने हैदराबाद शहर में 24 घंटे खुली रहने वाली करीब 50 फार्मेसियां खोल दी हैं। वहीं अब इसी तरह की ब्रांडेड दवा की दुकाने और भी कंपनियां खोलने लगी हैं। सभी कंपनियां अपने उपभोक्ताओं को लायल्टी प्वाइंट दे रही हैं। वहीं औषधि नामक दवा की दुकानों की चेन सिनियर सिटिजन को दवा खरीदने पर डिस्काउंट देती है। यानी सारी कवायद इस बात को लेकर हो रही है कि ग्राहकों का जो वर्ग हो वह समान्य दुकानों से अलग हटकर सारी खरीददारी अब ब्रांडेड दुकानों से ही करे। हालांकि इसके अपने फायदे भी हैं। इन दुकानों मे क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही आप एक नेटवर्क के सदस्य होकर दवा या अन्य सामान कहीं से भी खरीद सकते हैं। इसके साथ ही ऐसी दुकानों से खरीदी गई दवा के नकली या एक्सापाइरी डेट होने की संभावना काफी कम हो जाती है। यह रिपोर्ट बार बार आती रही है कि असंगठित क्षेत्र की दवा की दुकानों में भारी मात्रा में नकली दवाओं के मिलने की संभावना भी जताई गई है।

अन्य क्षेत्रों में भी - ब्रांडिंग का यह दौर सिर्फ चिकेन या दवा कंपनियों में ही नहीं बल्कि जूतों व अन्य सामनों में भी देखने को मिल रहा है। इन सभी कंपनियों को आईटी क्रांति का लाभ मिला है क्योंकि ऐसे ब्रांडेड नेटवर्क अपनी चेन की सभी स्टोरों को रोज की बिक्री और स्टाक का लेखाजोखा एक जगह बैठे रहकर केंद्रीयकृत नेटवर्क के जरिए ही देख सकते हैं। कुछ पुराने बड़े व्यवसायियों ने बड़े शहरों में अपने ब्रांड बनाने की शुरूआत कर दी है। जैसे दिल्ली में ज्वेलरी में पीपी ज्वेलर्स ने कई शोरूम खोल लिए हैं। वहीं कपड़ों और मिठाइयों के शो रूम वाले भी कई बड़े शहरों में अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहे हैं।

Tuesday, 31 May 2011

अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल.. समय की जरूरत


हाल में भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने घोषणा की है कि वह बीबीसी और सीएनएन जैसा अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनल शुरू करेगा। इस चैलन की शुरूआत के लिए लगभग 350 करोड़ की भारी भरकाम राशि का निवेश किया जाएगा। जाहिर है कि इसके लिए दूरदर्शन दुनिया भर में अपने पत्रकारों की टीम की नियुक्ति करेगा। कुछ लोग इसे सरकार के लिए पैसे की बरबादी मान रहे हैं। पर इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए तो वास्तव में ऐसा नहीं है। 

आज हम एज हम इन्फारमेशन में जी रहे हैं। इस युग में जो जितना सूचना संपन्न है वह उतना ही शक्तिशाली है। आज दुनिया में लड़ाई सिर्फ हथियारों से ही नहीं लड़ी जा रही है। बल्कि एक लड़ाई ऐसी भी लड़ी जा रही है जिसमें लोगों को सूचना देकर अपने पक्ष में करने की कोशिश की जाती है। यह दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत दुनिया में चीन और अमेरिका के बाद तीसरी सबसे बड़ी शक्ति के रुप में उभर रहा है। ऐसे में भारत को अपनी छवि को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पेश करने के लिए एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय समाचार चैनल की आवश्यकता है। जैसी खबरों को लेकर साख बीबीसी  और सीएनएन, फाक्स न्यूज या एनबीसी की है उसी तरह का एक चैनल भारत की ओर से हो यह बहुत बड़ी जरूरत है।

जो लोग यह सोचते हैं कि इस चैनल से कोई आर्थिक लाभ नहीं होगा, वे गलत सोचते हैं। बहुत सारे काम आर्थिक लाभ के लिए ही नहीं किए जाते हैं बल्कि इमेज बिल्डिंग के लिए भी किए जाते हैं। आज भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए अपनी दावेदारी जता रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद के लिए अपने उम्मीदवार शशि थरुर को प्रस्तुत कर रहा है। टाइम जैसी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं की कवर स्टोरी भारत पर बन रही है। ऐसे में भारतीय पक्ष को विश्व पटल पर पेश करने के लिए हमें एक अंतरराष्ट्रीय मंच की बहुत बड़ी जरूरत है।

अब हम बीबीसी और सीएनएन की भूमिका को समझने की कोशिश करें। पूरी दुनिया में बीबीसी की खबरों को लेकर साख है। हिंदुस्तान के गांव के लोग एक जमाने से बीबीसी रेडियो की खबरों की विश्वसनीयता के कायल है। इसके लिए बीबीसी ने हमेशा सबसे अच्छा वेतनमान देकर हिंदी के बेहतरीन पत्रकारों को अपनी सेवा में रखा है। क्या बीबीसी की हिंदी सेवा, टीवी चैनल और रेडियो और इंटरनेट पर हिंदी में आकर्षक वेबसाइट ये सब कुछ आर्थिक लाभ के लिए हैं। नहीं यह सब कुछ ग्रेट ब्रिटेन की विदेश नीति का हिस्सा है। वही ब्रिटेन जिसने दुनिया के दर्जनों देशों पर लंबे समय तक शासन किया। 

अब अपनी खबरों की विश्वसनीयता को लेकर दुनिया के अन्य देशों के मानस पटल पर प्रभाव जमा रहा है। यह सब कुछ ब्रिटेन की विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें हिंदी, उर्दू, बांग्ला जैसी कई अन्य भाषाओं के लिए अपनी सेवा आरंभ कर रखी है। अगर हम बीबीसी की खबरों को सूक्ष्मता से समझने की कोशिश करें तो वह हर जगह बड़ी ही सफाई से ग्रेट ब्रिटेन के हितों का ख्याल रखने की कोशिश करता है। इसको आम आदमी नहीं समझ सकता। वह तो बीबीसी की क्रिडेबलिटी का कायल है। यही बीबीसी की बहुत बड़ी सफलता और उसकी जमा पूंजी है। ठीक इसी तरह वाइस आफ अमेरिका और रेडियो जर्मनी जैसे चैनल हैं। या दुनिया कई और संपन्न देश जो हिंदी में पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन करते हैं और रेडियो तथा टीवी चैनलों पर अपनी उपस्थिति पेश करते हैं। यह सब कुछ एक सोची समझी लंबे समय तक चलाई जाने वाली स्ट्रेडजी के तहत होता है।  
---- विद्युत प्रकाश मौर्य - Vidyut Prakash Maurya
E mail - vidyutp@gmail.com 



Tuesday, 24 May 2011

बाजार में डीटीएच में नए खिलाड़ी


देश की सबसे पुरानी डीटीएच सेवा डिश टीवी है जो जी समूह की ओर से शुरू की गई थी लेकिन डिश टीवी को टक्कर देने आया टाटा के साथ संयुक्त उद्यम के रुप में स्टार की डीटीएच सेवा टाटा स्काई। आज बाजार में सात डीटीएच आपरेटर हैं। डिश टीवी, टाटा स्काई, एयरटेल, सन डाइरेक्ट, रिलायंस बिग, विडियोकान डीटूएच और दूरदर्शन का डीडी डाइरेक्ट प्लस। जब बाजार में पहला डीटीएच आया तो इसे लगाने  में 4000 रूपये से ज्यादा खर्च आ रहा था लेकिन बाजार में कई आपरेटरों के आ जाने के बाद अब डीटीएच सस्ता हो गया है।

अब कई विकल्प मौजूद  - अब उपभोक्ता के सामने डाइरेक्ट टू होम खरीदने के समय भी कई तरह के विकल्प मौजूद हैं। अगर वह बिल्कुल मुफ्त में डीटीएच चाहता है तो उसके सामने दूरदर्शन का डीटीएच मौजूद है। इसमें मुफ्त में 60 से ज्यादा टीवी चैनल मौजूद हैं। अगर आप पैसे देकर देखना चाहते हैं तब जीटीवी समूह का डिश टीवी और टाटा स्काई विकल्प के रुप में हैं। जाहिर है पेड डीटीएच में टीवी चैनलों के ज्यादा विकल्प मौजूद हैं। जब जी टीवी समूह का डीटीएच आया तब लोगों को इस बात का अंदेशा था कि इसमें स्टार टीवी के चैनल नहीं दिखाई देंगे। हुआ भी यही। इसलिए डिश टीवी उतना लोकप्रिय नहीं हो सका। अब नए समझौते के तरह डिश टीवी के बुके मे स्टार के भी सभी चैनल उपलब्ध हैं वहीं स्टार के बुके में जी टीवी समूह के भी सभी चैनल।

अंतर क्वालिटी का - जब आप डीटीएच तकनीक का इस्तेमाल करते हैं तो आपको सबसे बड़ी आजादी इस बात की मिलती है कि आप बेतार सिस्टम से जुड़ जाते हैं। यानी केबल से आजादी। आप अपने डीटीएच सिस्टम को कहीं भी लेकर जा सकते हैं। गांव में भी फार्म हाउस में भी। आमतौर पर केबल आपरेटर शहर या कस्बे की घनी आबादी में ही मौजूद होते हैं। डीटीएच पर आपको डीवीडी क्वालिटी की तस्वीर प्राप्त होती है। जबकि केबल प्रसारण अभी भी आमतौर पर एनलाग तकनीक से हो रहा है। यानी डीटीएच पर केबल की तुलना में साफ तस्वीरें प्राप्त होती हैं। डीटीएच का मुकाबला करने के लिए केबल आपरेटरों को अपनी तकनीक उन्नत करने में लगे हैं। साथ ही मासिक शुल्क को भी प्रतिस्पर्धात्मक रखना केबल आपरेटरों के लिए चुनौती है।
अब बाजार में हाई डेफिनेशन क्वालिटी का डीटीएच भी आ चुका है। इसके सेट टाप बाक्स की कीमत परंपरागत डीटीएच से कुछ अधिक ली जा रही है।  अगर आपके पास हाई डेफिनिशन टीवी है तो आपको डीटीएच भी एचडी ही खरीदना चाहिए।
वैल्यू एडेड सेवाएं - सभी डीटीएच आपरेटर कई तरह की वैल्यू एडेड सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। इनमें मूवी आन डिमांड और वीडियो गेमिंग जैसी चीजें खास है। डीटीएच आपरेटरों का लक्ष्य है कि आपको घर में अलग से डीवीडी प्लेयर रखने की कोई जरूरत न रहे। आप जो भी नई पुरानी फिल्में देखना चाहते हैं वह सब आपको मूवी आन डिमांड के तहत प्राप्त हो जाएंगी। टाटा स्काई डीटीएच ने बच्चों के लिए खास तौर पर आनलाइन गेमिंग की सेवा आरंभ की है। हां आपको इन सब चीजों के लिए अलग से शुल्क चुकाना पड़ता है।

महंगा नहीं है डीटीएच - अगर आपर डीटीएच स्थापित करना चाहते हैं तो आपको इसके लिए महज उपकरणकी कीमत के रुप में 1500 से से 2000 रुपए तक देने हैं। वहीं दूरदर्शन का फ्री डीटीएच भी 1500 रुपए में स्थापित कराया जा सकता है। जहां तक मासिक शुल्क का सवाल है डीटीएच औसतन 150 रूपये प्रति माह के शुल्क पर उपलब्ध है। लेकिन आपको अपनी पसंद के अलग अलग चैनलों के लिए अलग फीस चुकानी पड़ती है। लेकिन डीटीएच में अपनी पसंद का चैनल चुनने की आजादी उपभोक्ताओं को है। बड़े शहरों में इससे अधिक राशि फिलहाल केबल आपरेटर ले रहे हैं। बाजार में खिलाड़ी आ जाने के बाद इसकी कीमतें फिलहाल बढ़ने की कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही है।
सात डीटीएच आपरेटर
1.  डिश टीवी
2.  टाटा स्काई
3.  एयरटेल
4.  सन डाइरेक्ट
5.  रिलायंस बिग
6.  वीडियोकान डीटूएच
7.  दूरदर्शन का डीडी डाइरेक्ट प्लस

दस साल में डीटीएच के सफर की बात करें तो अब सभी डीटीएच आपरेटरों के कुल कनेक्शन की संख्या देश भर में दो करोड़ को पार कर चुकी है।
 -विद्युत प्रकाश मौर्य



Monday, 16 May 2011

अब आया डीवीडी कैमकार्डर का दौर


रिकार्ड कीजिए और तुरंत अपने कंप्यूटर या टीवी पर देखिए। यह संभव हो सकता है डीवीडी कैमकार्डर की बदौलत। पिछले कुछ सालों में लोगों में अपने जीवन से जुड़े यादगार लम्हों के वीडियो बनाने का प्रचलन बढ़ा है। ऐसा इसिलिए भी हो सका है कि वीडियो रिकार्डिंग अब आसान हो गई है। साथ ही मूवी कैमरों की कीमतों में गिरावट आई है वहीं उसकी गुणवत्ता में भी इजाफा हुआ है। कुछ साल पहले जहां सिर्फ शादी व बड़े समारोहों की वीडियो रिकार्डिंग होती थी वहीं अब हर प्रमुख कार्यक्रम की वीडियो बनाना आसान हो गया है। चाहे अपने बच्चे का बर्थ डे मना रहे हों या कहीं भी घूमने जा रहे हों सबकुछ का वीडियो बना सकते हैं। अब स्तरीय कंपनियों के वीडियो कैमरों की कीमतें 11 हजार रुपए से आरंभ हो जाती हैं।
वीएचएस से डीवीडी तक -
कुछ साल पहले जो वीडियो कैमरे प्रचलन में थे उनमें वीएचएस (वीडियो होम सर्विस) वाले 180 मिनट के कैसेट डालकर रिकार्डिंग की जाती थी। ये कैमरे आकार में भी बड़े होते थे वहीं इनकी कीमत भी 35 हजार से 70 हजार तक थी। उसके बाद भी इन कैमरों की वीडियो रिकार्डिंग इतनी स्तरीय नहीं होती थी कि उन्हें सालों तक संभाल कर रखा जा सके। उसके बाद छोटे हाई8 कैसेट वाले कैमरों का दौर आया। भारत में आजकल ज्यादातर लोग ऐसे ही कैमरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसमें आडियो कैसेट के साइज के फीते वाले एनलाग कैसेट का इस्तेमाल होता है। अगर आप अपने वीडियो फुटेज को सीडी में संभाल कर रखना चाहते हैं इस कैसेट को लैब में ले जाकर सीडी में परिवर्तित कराना पड़ता है। एक सीडी में 80 मिनट तक का वीडियो रिकार्ड करके रखा जा सकता है। वहीं बेहतर क्वालिटी के लिए इन्हें डीवीडी पर रिकार्ड करवाया जा सकता है। एक डीवीडी में दो घंटे से लेकर 18 घंटे तक की रिकार्डिंग की जा सकती है। 

यानी इसको संभालकर रखना व कहीं लेकर जाना बहुत आसान हो गया है।
पर अब कैमरा बनाने वाले कंपनियां लोगों की मुश्किलों को और आसान करने में लगी हैं। उन्होंने अब डीवीडी कैमकार्डर पेश कर दिया है। सोनी और नेशनल पानासोनिक जैसी कंपिनयां ऐसा कैमकार्डर लेकर आ गई हैं। इनमें आप सीधे एक डीवीडी लगा सकते हैं जो कुछ भी आप शूट करेंगे वह सीधे ही डीवीडी पर रिकार्ड होता रहेगा। इस तरह के कैमकार्डर में आमतौर पर साढ़े चार घंटेतक की रिकार्डिंग की जा सकती है। एक अगर भर गया तो तुरंत दूसरी डिस्क लगा दीजिए पर अपनी रिकार्डिंग को निर्बाध तरीके से जारी रख सकते हैं।

आसान हुई राह -
डीवीडी कैमकार्डर ने वीडियो बनाने की पेचीदगियों को कम कर दिया है वहीं कई मिक्सिंग व ट्रांसफर के चरणों को आसान कर दिया है। आप खुद रिकार्ड करने के बाद अपने कंप्यूटर पर उसका संपादन भी कर सकते हैं। आने वाले कुछ साल में बाजार से सीडी की खपत कम होगी और स्टोरेज क्षमता की अधिकता के कारण डीवीडी की लोकप्रिय होंगे। अगर आप वीडियो शूट करने के लिए किसी मूवी कैमरा को खरीदने की योजना बना रहे हैं तो आप सीधे डीवीडी कैमकार्डर खरीदने के विकल्प पर विचार करें। यह अभी सीसीडी कैमकार्डर की तुलना में थोड़ा मंहगा जरूर है पर इसमें उपलब्ध सुविधाओं आपकी कई मुश्किलों को आसान भी कर देंगी।
---- vidyutp@gmail.com




Thursday, 12 May 2011

मनोरंजन चैनल बनाम समाचार चैनल


कई बार टीवी पर कोई समाचार चैनल देखते हुए यह प्रतीत होता है मानो कोई मनोरंजन चैनल ही देख रहे हों। समाचार चैनल अब अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए मनोरंजक कार्यक्रमों को तरजीह देने लगे हैं। वे फैशन और ग्लैमर से भरे कार्यक्रमों को स्क्रीन पर पर्याप्त समय देते हैं। जैसे किसी फैशन शो की कवरेज पांच से सात मिनट तक लंबी दिखाई जाती है। फिल्मी पार्टियों और समारोहों को खास तवज्जों दी जाती है। आजकल स्टार न्यूज और आजतक जैसे चैनल पर हर रोज आधे से एक घंटे तक फिल्मी खबरें देखी जा सकती हैं। जबकि पहले इस तरह के फिल्मी न्यूज और गासिप के बुलेटिन सिर्फ जी सिनेमा और सेट मैक्स जैसे फिल्मी चैलनों पर आया करते थे। स्टार न्यूज ने तो इससे आगे बढ़कर टीवी सीरियलों पर आधारित खबरों का कार्यक्रम आरंभ कर दिया है। इसमें न सिर्फ स्टार प्लस बल्कि अन्य टीवी चैलनों के धारावाहिकों से जुड़ी हुई खबरें और गासिप प्रसारित किया जाता है। हम बात कर रहे हैं सास बहू और साजिश की।

समाचार चैनलों ने कई धार्मिक आयोजन और कई फिल्मी पार्टियों के लाइव टेलीकास्ट की भी व्यवस्था की है। अभी हाल में उद्योगपति विजय मल्या ने अपना 50वां जन्म दिन मनाया तो कई टीवी चैनलों के कैमरे गोवा में चार दिन के जश्न में मौजूद थे और पल-पल की खबरें दर्शकों तक पहुंचा रहे थे। कई बार दर्शकों की किसी विषय में खास रुचि नहीं होती है। पर टीवी चैनल उन्हें बार बार दिखा दिखा कर खबरों को काफी प्रचारित कर देते हैं। मध्य प्रदेश के एक शहर के मामूली से ज्योतिषी ने अपने मरने की तारीख मुकर्रर कर दी। उसके बाद दिन भर कुछ टीवी चैनल इस कार्यक्रम को लाइव दिखाते रहे। हालांकि वह व्यक्ति नहीं मरा। पर देश भर के लोगों का इस अंधविश्वास पूर्ण घटना के साथ वक्त जरूर बर्बाद हुआ।

मनोरंजन और खबर के बीच एक पतली सी ही सही पर सीमा रेखा जरूर खींची जानी चाहिए। अगर समाचार चैनल ही लोगों का मनोरंजन करने लग जाएं तो मनोरंजन चैनलों का प्रोफाइल क्या रह जाएगा। यह जरूर है कि खबरों की प्रस्तुति रोचक होनी चाहिए। परंतु रोचकता भी कितनी।

 31 दिसंबर को आजतक ने साल भर की प्रमुख घटनाओं पर आधारित कार्यक्रम बनाया गजब भयो रामा। इस कार्क्रम की एंकर मिनी स्कर्ट और स्लीवलेस टाप में अलग अलग पब्लिक प्लेसेज में घूम-घूम कर साल भर की घटनाओं को चासनी लगा कर अपनी मधुर आवाज में पेश कर रही थीं। यानी की टीवी की एंकरों का पहनावा भी अब किसी माडल की तरह होना चाहिए। क्या उन्हें लोगों की नजरों में चढ़ने के लिए अंग प्रदर्शन करना पड़ेगा। जब टीवी चैनल की एंकर किसी खास स्थल से रिपोर्टिंग करती है तो उसका पहनावा वहां के वातावरण के अनुकूल होता है। यह एक हद तक जायज भी है। पर समाचार चैनलों का मुख्य उद्देश्य सूचना देना ही होना चाहिए न कि मनोरंजन करना।
-विद्युत प्रकाश, vidyutp@gmail.com

Tuesday, 10 May 2011

कमाई के बडे साधन है सूचना विज्ञापन- टेली शापिंग


टीवी पर आप कई बार आधे-आधे घंटे का विज्ञापन प्रोग्राम देखते हो। यानी ऐसे विज्ञापन जो किसी प्रोडक्ट केबारे में विस्तार से बताते हैं। वास्तव में ये सूचना विज्ञापन कमाई के बहुत बड़े साधन हैं। 1984 में अमेरिका सरकार ने निजी टीवी चैनलों को यह छूट प्रदान कर दी कि वे दो मिनट से ज्यादा बडे़ विज्ञापन दिखा सकते हैं। इससे पहले कोई भी विज्ञापन दो मिनट से कम का ही होता था। पर इस कानून के पास हो जाने के बाद टीवी चैनलों को आजादी मिल गई। वे टीवी धारावाहिक जैसे ही विज्ञापन बनाने लगे। अब टीवी पर जब टेली शापिंग के एड चलने लगते हैं तो कई बार यह समझना मुश्किल हो जाता है कि यह धारावाहिक चल रहा है या विज्ञापन। इन विज्ञापनों में कई बार जाने माने फिल्म स्टार आते हैं जो इन प्रोडक्ट के बारे में अपने निजी अनुभव बताते हैं। कई बारे खेल जगत के सितारे होते हैं।
इन दिनों टीवी पर सूचना विज्ञापनों की बाढ़ आ गई है। इसके साथ ही शुरू हुआ टेली शापिंग का दौर। यानी टेलीविजन पर चलने वाली दुकानें। नब्बे के दशक में दुनिया के लगभग हर देश में टीवी पर सूचना विज्ञापनों की बाढ़ सी आ गई। ये सूचना विज्ञापन महज विज्ञापन नहीं होते। ये आपको किसी नए प्रोडक्ट के बारे में विस्तार से सूचना देते हैं। ठीक ऊसी तरह जैसे अखबार के बिजनेस पन्ने पर आप देखते हैं। हालांकि ये सूचना विज्ञापन टीवी चैनलों की कमाई के बहुत बड़े जरिया के रुप में ऊभरे है। नए उत्पादों के संपूर्ण परिचय के बाद ये बताते हैं कि इन उत्पादों को आनलाइन कहां से खरीदा जा सकता है। बस एक फोन घुमाएं और सामान घर पर ही मंगवाएं।

थोड़ा सावधान रहें - अक्सर टीवी पर टेली शापिंग में वैसे ही प्रोडक्ट होते हैं जो हर किसी को अपनी जरूरत प्रतीत होते हैं। जैसे कद बढ़ाने वाले, रंग गोरा करने वाले, मोटापा घटाने वाले। अगर आप टीवी पर देखकर किसी सामान का आर्डर करते हैं तो थोड़ा सावधान रहें। हो सकता है ये प्रोडक्ट बाजार में आपको इससे भी सस्ते दामों पर ही उपलब्ध हो। अगर इन प्रोडक्ट विज्ञापन आपका कोई पसंदीदा स्टार या रोल माडल कर रहा हो तो भी धोखे में न आएं।
भारत में लगभग सभी म्यूजिक चैनलों, मनोरंजन चैनलों और कुछ समाचार चैनलों पर इस तरह के सूचना विज्ञापन आते हैं। कई चैलनो पर तो देर रात इस तरह के विज्ञापनों की भरमार देखने को मिलती है। आप कोई भी चैनल बदलें उसपर कोई इस तरह का विज्ञापन आता हुआ दिखाई देता है। टेलीशापिंग पर कोई भी आर्डर करने से पहले यह भी अच्छी तरह परख लेना चाहिए कि क्या वास्तव में आपको इस तरह के किसी प्रोडक्ट की जरूरत है। कई बार ऐसे विज्ञापन आपको भ्रमित कर देते हैं। आप उनके शब्दजाल में फंस जाते हैं और फटाफट फोन घुमा कर आर्डर कर देते हैं।
-विद्युत प्रकाश, vidyutp@gmail.com


Sunday, 8 May 2011

बड़ा होकर गायक बनूंगा...


किसी जमाने में कहावत थी पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे होगे खराब....पर नए जमाने में यह कहावत बदल गई है। अब बच्चे खेलकूद कर सचिन सहवाग बनना चाहतें है। उन्हें खेल में भी संभावना नर आती है। कैरियर नजर आता है। पर अब कैरियर का एक नया विकल्प आ गया है। अब जिस टीवी चैनल को स्वीच करो वहां बच्चे गीत गाते हुए नजर आते हैं और पुराने गायक उन्हें दिल से आशीर्वाद दे रहे होते हैं। हां तुम बड़े होकर बहुत बड़े गायक बनोगे। किसी चैनल पर लिट्ल चैंप्स नाम से तो किसी चैनल पर छोटे उस्ताद नाम से बच्चों के बीच गायकी के मुकाबले करवाए जा रहे हैं। 

पहले तो नौजवान गायकों के बीच गायकी के मुकाबले करवाए गए, पर जब कई चैनलों ने इन नौजवानों गायकों को स्थापित कर दिया तो अब बच्चों का बीड़ा उठाया है। वैसे हमने सुना है कि कई चैनलों के विजेता गायकों को भी बाद में फिल्मों में ज्यादा काम नहीं मिला। कई जब विजेता बने थे तो देश भर में धूम थी, लाखों एसएमएस आ रहे थे पर बाद में सब कुछ समान्य हो गया। बड़ी मुश्किल से एक म्यूजिक चैनल के विजेता गायक ने अपना अलबम निकाला भी तो उसको बाजार नहीं मिला।
अब टीवी चैनल वाले बड़े गायकों पर हाथ आजमा लेने के बाद नन्हीं उम्र के गायकों में संभावानाएं तलाशने में लगे हैं। सभी बड़े महानगरों में आडिशन लिए जा रहे हैं और नन्ही उम्र में गायकी की प्रतिभा तलाशी जा रही है। पर क्या नन्ही उम्र के ये गायक बड़े होकर गायकी को अपना कैरियर बना सकेंगे। अगर हम निष्पक्ष रूप से देखें तो स्कूली उम्र पढ़ाई की होती है। इस दौरान अगर कोई एजुकेशनल प्रतियोगिता कराई जाए तो इसका लाभ बच्चों को मिलता है। इसके लिए नेशनल टैलेंट सर्च जैसी प्रतियोगिताएं भी हैं। जिन बच्चों में किसी खेल की प्रतिभा होती है उन्हें बचपन से ही उस खेल का प्रशिक्षण दिया जाता है। ठीक इसी तरह जिसको म्यूजिक का शौक होता है, उन्हें गायकी सिखाई जाती है। इसके लिए नियमित रूप से म्यूजिक के क्लास दिए जाते हैं। आगे चलकर बच्चे म्यूजिक को कैरियर के रुप में भी चुन लेते हैं। पर टीवी चैनलों पर जो संगीत प्रतियोगिता कराई जाती है, वह एकेडमिक म्यूजिक से कुछ अलग हटकर है। यहां बच्चों को फिल्मी गानों की पैरोडी गानी पड़ती है, हालांकि संगीत और सुर यहां भी है, पर यह एक तरह की नकल भी है। यहां प्रतिभा का प्रदर्शन कम है। देश में ऐसे हजारों लाखों लोग हैं जो किसी फिल्मी गाने को नकल करके गा देते हैं। पर वे सभी लोग बाद में सफल गायक इसलिए नहीं बन पाते क्योंकि उन्होंने म्यूजिक की कोई नियमित तालीम नहीं ली होती है। कई टीवी चैनलों पर नियमित तौर पर आने वाले गानों पर आधारित रियलिटी शो इसमें भाग लेने वाले बच्चों का महीनो समय तो बरबाद करते ही हैं साथ ही देखने वालों का भी काफी समय बरबाद होता है। इससे देश के करोड़ो बच्चे अपनी नियमित स्कूली पढ़ाई से विमुख हो रहे हैं। जैसे टैलेंट हंट निकले नौजवान गायक म्यूजिक के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं कुछ इसी तरह का हाल इन बच्चों के साथ भी हो सकता है। गायक के रुप में कैरियर बनाना हो तो उस प्लेटफार्म पर जगह बहुत थोड़ी है। पर गायक बनने की होड़ में काफी लोग हैं। इसलिए रियलिटी शो के दौरान देश भर में चर्चा में रहने वाले गायकों को लोग बाद में भूल जाते हैं। उनके आडियो कैसेट या सीडी को कोई खरीदने वाला भी नहीं होता। हमें आने वाली पीढ़ी को ऐसे खतरों से बचाना होगा। 
--- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com