Thursday, 9 May 2019

प्रेमलाबाई चह्वाण - महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा समय तक संसद में रहने वाली महिला


( महिला सांसद 56 ) प्रेमलाबाई चह्वाण पहली बार 1973 में महाराष्ट्र के करड लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। वे कुल चार बार लोकसभा का चुनाव जीतीं, वहीं वे उच्च सदन राज्यसभा की भी सदस्य रहीं। महिला सांसद के तौर पर महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा समय तक संसद में रहने का रिकॉर्ड उनके नाम है। 
चार बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा में
अपने पति की मृत्यु के बाद प्रेमलाबाई 1973 में पांचवीं लोकसभा में निर्विरोध चुनकर संसद में पहुंची। इमरजेंसी के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस देवराज अर्स गुट बन गया, पर प्रेमलाबाई इंदिरा गांधी के साथ रहीं। वे 1977 में छठी लोकसभा का चुनाव भी जीतीं। कुछ समय तक व महाराष्ट्र कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष भी रहीं। 1981 में इंदिरा गांधी ने उन्हें राज्यसभा में भेजा। वे एक बार फिर आठवीं लोकसभा (1984) में और नौंवी लोकसभा (1989) वे करड से चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। एक सांसद के तौर पर वे तमाम समितियों की सदस्य रहीं। 
गुजरात के वडोदरा में जन्म
उनका जन्म गुजरात के बडोदरा में एमएन राव जगादले के परिवार में हुआ था। उनकी शिक्षा इंदौर और सेंट जेवियर्स कॉलेज मुंबई में हुई। उन्होंने मांटेसरी शिक्षा में डिप्लोमा किया था। सन 1942 में उनका विवाह दाजीसाहेब चह्वाण के संग हुआ। जो कई बार सांसद और केंद्र में मंत्री रहे। उनके बेटे पृथ्वीराज चह्वाण महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। प्रेमलाबाई 1952 से 1960 तक किसान मजदूर पार्टी की सदस्य रहीं। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गईं।
महिला क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना
प्रेमलाबाई की शिक्षा और खेलों में काफी रुचि थी। सन 1973 में उन्होंने ऑल इंडिया वूमेन क्रिकेट एसोसिएशन की स्थापना की। वे इसकी संस्थापक अध्यक्ष थीं। 1951 में उन्होंने करड में पहला मांटेसरी स्कूल खोला था। 1950 में उन्होंने करड महिला मंडल की स्थापना की। करड में प्रेमलाबाई के नाम पर पॉलीटेक्निक की स्थापना की गई है। 
मराठी में लघुकथाएं लिखी
प्रेमलाबाई ने बेटे पृथ्वीराज चह्वाण के राजनीति में आने के बाद खुद राजनीति से संन्यास ले लिया। उनकी पढ़ने लिखने के अलावा खेल और बागवानी में रूचि थी। उन्होंने मराठी में कई लघु कथाएं भी लिखीं। उन्होंने सांसद के तौर पर दुनिया के कई देशों का दौरा भी किया था। साल 2003 में आठ जुलाई को उनका निधन हो गया। सतारा जिले में उनके नाम पर एक मध्य विद्यालय की भी स्थापना की गई है।
सफरनामा
1918 में 2 जुलाई को उनका जन्म हुआ
1942 में 27 अप्रैल को दाजीसाहेब चह्वाण के संग विवाह हुआ।
1973 में पहली बार लोकसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1981 में राज्यसभा के लिए चुनीं गईं।
2003 में 8 जुलाई को उनका निधन हो गया।
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Wednesday, 8 May 2019

सावित्री श्याम - पत्रकारिता से लोकसभा का सफर


( महिला सांसद - 55 ) सावित्री श्याम स्वतंत्रता सेनानी और पत्रकार थीं जो दो बार संसद में पहुंची। उन्होंने पहली बार उत्तर प्रदेश के आंवला क्षेत्र से 1967 में चौथी लोकसभा का चुनाव जीता। चौथे आम चुनाव से पहले परिसीमन के बाद आंवला लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया था।

भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सेदारी
सावित्री श्याम का जन्म मुजफ्फरनगर में 2 मई 1918 को हुआ। ने एमए और एलएलबी तक पढ़ाई की। उनकी शिक्षा आगरा विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय में हुई। उनका विवाह श्याम सुंदर के साथ 1939 में हुआ। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रियता से हिस्सा लिया था।
दो बार आंवला से जीतीं
आंवला लोकसभा सीट पर हुए पहले चुनाव में कांग्रेस ने 1967 में उन्हें उतारा। यहां पर सावित्री श्याम ने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार बीआर सिंह को कड़े मुकाबले में हराया था। पांचवी लोकसभा के चुनाव में 1971 में उन्होंने एक बार फिर जनसंघ के ही ब्रजराज सिंह को ज्यादा मतों के अंतर से हराया। पर 1977 में जनता लहर में वे आंवला सीट से ही भारतीय लोकदल के उम्मीदवार से पराजित हो गईं।
कई साल तक पत्रकारिता
उन्होंने 1940 में बरेली से पत्रकारिता की शुरुआत की। वे 1940 से 1947 के दौरान हिंदुस्तान टाइम्स, नई दिल्ली, लीडर, इलाहाबाद, सर्चलाइट, पटना, एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इंडिया और नेशनल हेराल्ड, लखनऊ जैसे समाचार पत्रों के लिए संवाददाता के तौर पर काम किया।  सावित्री 1955 से 1967 तक उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य रहीं। इसके बाद उन्होंने केंद्र की राजनीति का रुख किया।
कई संस्थाओं से जुड़कर समाजसेवा
अपनी संसदीय पारी में वे लोक लेखा समिति,  खानपान सलाहकार समिति, मध्य रेलवे, टेलीफोन सलाहकार समिति, महिला शिक्षा की राष्ट्रीय परिषद और  केंद्रीय लघु बचत सलाहकार बोर्ड की सदस्य रहीं। सावित्री अपने जीवन काल में तमाम सामाजिक संगठनों में भी सक्रिय रहीं। वे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन, लखनऊ की अध्यक्ष,  भारतीय बाल कल्याण और अनुसंधान ब्यूरो की अध्यक्ष रहीं। वे भारत सेवक समाज और कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय न्यास से भी जुड़ी हुई थीं।
गोविंद वल्लभ पंत पर पुस्तक लिखी
सावित्री श्याम ने पंडित गोबिंद वल्लभ पंत का राजनीतिक जीवन नामक पुस्तक भी लिखी। खाली समय में उनका प्रिय शौक पुस्तकें पढ़ना था। शराबंदी और खादी के प्रचार के लिए भी उन्होंने काफी काम किया। उन्होंने दुनिया के कई देशों का दौरा किया था पर उनका दिल हमेशा बरेली में ही बसता था।
सफरनामा
1918 में 2 मई को मुजफ्फरनगर में जन्म हुआ।
1939 में उनका विवाह श्याम सुंदर के संग हुआ।
1955 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य बनीं।
1967 में आंवला से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता
1971 में आंवला से दूसरी बार लोकसभा का चुनाव जीता।
1977 में जनता लहर में आंवला से पराजित हो गईं।
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Tuesday, 7 May 2019

शीला कौल - लखनऊ से सबसे ज्यादा मत प्रतिशत से जीतीं

( महिला सांसद 54 ) 
सौ साल से अधिक जीने वाली शीला कौल स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री, सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक और शिक्षाविद थीं। वे हिमाचल प्रदेश की पूर्व राज्यपाल भी थीं। उन्होंने लखनऊ में सबसे ज्यादा मत प्रतिशत से जीत का रिकार्ड बनाया था।

पांच बार सांसद चुनी गईं
शीला कौल पांच बार लोकसभा की सदस्य रहीं। वे 1971, 1980 और 1984 में लखनऊ से 1989 और 1991 में रायबरेली से चुनीं गईं। उनका लखनऊ में सबसे ज्यादा मत प्रतिशत से जीतने का रिकॉर्ड है। उन्हें 1971 में 171019 मत मिले थे जो 71.61 प्रतिशत थे। पर 1977 में हेमवती नंदन बहुगुणा ने लखनऊ में शीला कौल को डेढ़ लाख मतों से हराया। पर 1980 और 1984 में शीला कौल यहां से लगातार जीतीं।

केंद्र सरकार में मंत्री
शीला कौल ने 1982 से 1989 तक केंद्र सरकार में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में संस्कृति, शिक्षा और समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का काम संभाला। इसके बाद वे 1992 से 1995 के बीच  पीवी नरसिंह राव की कैबिनेट में केंद्रीय शहरी विकास मंत्री भी रहीं।

नेहरु परिवार से रिश्ता
शीला कौल देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साले प्रोफेसर कैलाशनाथ कौल की पत्नी और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मामी थी।आईटीबीपी के निदेशक रहे गौतम कौल और अंतरराष्ट्रीय खेल प्रशासक विक्रम कौल उनके बेटे हैं। उनकी बेटी दीपा कौल भी सामाजिक कार्यकर्ता रहीं। उनके पति कैलाशनाथ कौल जाने माने वनस्पति शास्त्री थे जिन्होंने लखनऊ में नेशनल बोटानिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की थी।

लखनऊ से राजनीति की शुरुआत
शीला लखनऊ में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय थी। सन 1936 में महात्मा गांधी लखनऊ में शीला कौल के आवास पर आए थे और वहां एक बरगद का पेड़ लगया था। उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत लखनऊ शहर से की। वे 1959 से 1965 तक लखनऊ नगर निगम में पार्षद रहीं। इसके बाद वे 1968 से 1971 तक यूपी विधान परिषद की सदस्य रहीं। उन्होंने पहला लोकसभा का चुनाव भी यहीं से लड़ा।  

लाहौर में पढ़ाई
शीला कौल कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से आती थीं। उनके पिता का नाम राजेश्वरनाथ कौल और माता का नाम सरस्वती कौल था। वे महिला कॉलेज लाहौर की कला की स्नातक थीं और लाहौर के सर गंगा राम प्रशिक्षण कॉलेज से उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण की डिग्री ली थी। उनकी बैडमिंट खेलने में रुचि थी। छात्र जीवन में स्टेट चैंपियन रह चुकी थीं। शीला कौल ने 2015 में अपना 101 जन्म दिन परिवार के साथ मनाया था। इसी साल की उम्र में 2015 में गाजियाबाद में निधन हो गया।

सफरनामा
1915 में 7 फरवरी को लखनऊ में जन्म हुआ।
1971 में लखनऊ से पहली बार लोकसभा का चुनाव जीता।
1982 से 1989 तक संस्कृति, शिक्षा और समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
1988 में कांग्रेस पार्टी की महासचिव चुनीं गईं।
1995 में हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल बनीं।
2015 में 13 जून को गाजिबाद में निधन हो गया।
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Monday, 6 May 2019

सुशीला रोहतगी-मालवीय जी की परपोती केंद्र सरकार में मंत्री रहीं

( महिला सांसद -53 ) 
सुशीला रोहतगी उत्तर प्रदेश के बिल्हौर से 1967 में कांग्रेस के टिकट पर चौथी लोकसभा का चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। उन्होंने दूसरी बार 1971 का चुनाव भी बिल्हौर से ही जीता। वे 1985 में उच्च सदन राज्यसभा की सदस्य भी चुनीं गईं। सुशीला रोहतगी केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री के अलावा शिक्षा और संस्कृति राज्य मंत्री भी रहीं।
यूपी विधानसभा की सदस्य
सुशीला रोहतगी 1959 में कानपुर नगर निगम की सदस्य चुनीं गईं। वे 1962 में कानपुर नगर से विधायक चुनीं गईं। उनका जन्म प्रयागराज में 1921 में 21 अगस्त को हुआ था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय के पोते कपिलदेव मालवीय की बेटी थीं। उनकी स्कूली शिक्षा थियोसोफिकल स्कूल इलाहाबाद, सेंट मेरी कान्वेंट और क्रासथवेट गर्ल्स कॉलेज और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। उन्होंने इतिहास में एमए किया था। उनका विवाह 1947 में समाज सुधारक महेंद्र रोहतगी के साथ हुआ। उनके दो बेटें और तीन बेटियां हुईं। वे 1945 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर नियुक्त हुईं।
केंद्र सरकार में मंत्री
सुशीला रोहतगी को मई 1971 में इंदिरा गांधी ने अपनी सरकार में वित्त राज्यमंत्री बनाया। बाद में राज्यसभा के सदस्य के कार्यकाल में वे 1985 में राजीव गांधी के मंत्रीमंडल में शिक्षा और संस्कृति राज्यमंत्री बनाई गईं। बाद में 1989 तक उन्होंने कई और मंत्रालयों का कामकाज देखा। वे ऑल इंडिया वूमेन कान्फ्रेंस में भी सक्रिय रहीं। वे कान्फ्रेंस की कानपुर शाखा की अध्यक्ष भी रहीं।  
कई संस्थाओं की सदस्य
सुशीला रोहतगी लखनऊ यूनीवर्सिटी कोर्ट की सदस्य रहीं। वे यूपी सिटिजन्स कौंसिल, यूपी सरकार में उच्च शिक्षा और महिला शिक्षा समिति की भी सदस्य रहीं। वे यूपी स्टेट सोशल वेलफेयर बोर्ड, कानपुर नगर निगम के कार्यकारी समिति की भी सदस्य रहीं। वे यूपी बोर्ड टेक्निकल एजुकेशन फॉर वूमेन की भी सदस्य रहीं। सांसद के तौर पर वे शांति परिषद हेलिंसकी में 1965 में भारत का प्रतिनिधित्व करने गईं। वे 1958 में कोलंबों में हुए एफ्रो एशियन वूमेन कान्फ्रेंस में भी गईं।
बापू पर पुस्तक लिखी
सुशीला रोहतगी ने बापू ने कहा था नामक पुस्तक हिंदी में लिखी। तमाम पत्र पत्रिकाओं में वे हिंदी और अंग्रेजी में अक्सर लिखती थीं। उनकी रूचि शास्त्रीय संगीत और नृत्य में भी थी। खेलों में उनकी रूचि बैडमिंटन में रही। खाली समय में उन्हें साहित्य पढ़ना पसंद था। नब्बे साल की उम्र में कानपुर में 2011 में उनका निधन हो गया।
सफरनामा
1921 में 21 अगस्त को प्रयागराज में जन्म हुआ।
1947 में 27 जनवरी को महेंद्र रोहतगी के साथ विवाह हुआ।
1962 में उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1967 में बिल्हौर (यूपी) लोकसभा का चुनाव जीता।
1985 में वे राज्यसभा की सदस्य चुनीं गईं।
1988 से 1994 तक यूपी विधानपरिषद की सदस्य रहीं।
2011 में नौ अप्रैल को उनका निधन हो गया।


Sunday, 5 May 2019

राधाबाई : भद्राचलम से लगातार चार बार सांसद चुनीं गईं

 ( महिला सांसद -52 ) 
बी राधाबाई आनंदराव आंध्र प्रदेश की राजनीति का दलित चेहरा रहीं। चौथी लोकसभा में 1967 में वे भद्राचलम से कांग्रेस पार्टी के टिकट पर चुनाव जीत कर पहली बार संसद में पहुंची। इसके बाद वे लगातार चार बार लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहीं। उन्होंने खास तौर पर आदिवासियों को और कोयला खान मजदूरों के लिए काम किया।

जनता लहर में भी शानदार जीत
राधाबाई ने 1967 के बात 1971, 1977 और 1980 का चुनाव भी भद्राचलम लोकसभा क्षेत्र से जीता। उन्होंने 1977 में जनता लहर में भी कांग्रेस पार्टी के टिकट पर शानदार जीत दर्ज की। 1977 में उन्होंने लोकदल के पी वाणी रमाराव को 96 हजार मतों से पराजित किया। सन 1980 के चुनाव में उन्होंने भाकपा उम्मीदवार के चंद्रैया को पराजित किया। वे 1984 का लोकसभा चुनाव भी लड़ी थीं पर इस बार में भाकपा उम्मीदवार एस रमैया से पराजित हो गईं।

मजदूर कांग्रेस की नेता
राधाबाई का जन्म खम्मम जिले के वेंकटापुरम में 2 फरवरी 1930 को हुआ था। उनकी पढ़ाई राजामुंदरी ट्यूटोरियल कॉलेज में हुई। शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने शिक्षा जगत का रुख किया। राधाबाई का 1952 में 6 जून को बीके आनंद राव के साथ विवाह हुआ। उनकी तीन संताने हुईं एक बेटा और दो बेटियां। राधाबाई ने कांग्रेस के मजदूर संगठन इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के लिए काम शुरू किया। वे कोठागुदम पंचायत समिति की सदस्य भी रहीं।
कोयला खान मजदूरों के लिए काम
राधाबाई ने सिंगरेनी के कोयला खदानों में परिवार कल्याण कार्यकर्ता के तौर पर काम शुरू किया। इस दौरान उन्होंने आदिवासियों की समस्याएं करीब से समझीं। राधाबाई ने खास तौर पर आदिवासी लोगों और कोयला खदान में काम करने वाले मजदूरों के कल्याण के लिए कार्य किया। आंध्र प्रदेश के आदिवासियों के बीच उनकी छवि काफी लोकप्रिय थी।
कई देशों की यात्रा की
राधाबाई को लघु कथाएं पढ़ने और संगीत से लगाव रहा। उन्होने संसदीय समिति के सदस्य के तौर पर चेकोस्लोवाकिया, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों की यात्राएं की। संसदीय पारी खत्म होने के बाद वे वे खम्मम के रमावरम में रहने लगीं।  
जब दो बहनों में हुआ मुकाबला
सन 1971 के चुनाव में भद्राचलम चर्चा में आ गया था क्योंकि तब राधाबाई के खिलाफ उनकी ही छोटी बहन पी वानी रमन्नाराव जो विधान परिषद की सदस्य थीं, कांग्रेस ओ के टिकट से लड़ गईं थीं। हालांकि वानी रमन्नाराव 8 हजार वोट पाकर चौथे स्थान पर रहीं थीं।

सफरनामा
1930 में 2 फरवरी को उनका जन्म खम्मम जिले में हुआ।
1952 में 6 जून को उनका विवाह बीके आनंद राव के साथ हुआ।
1967 में चौथी लोकसभा का चुनाव जीता।
1971, 1977 और 1980 में भी जीत दर्ज की।
1984 का चुनाव भाकपा उम्मीदवार से हार गईं।
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Saturday, 4 May 2019

पद्मावती देवी -विश्वविद्यालय के लिए महल दान कर दिया


(महिला सांसद- 51 ) छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से सांसद की दहलीज तक पहुंचने वाली एकमात्र महिला रानी पद्मावती सिंह रहीं। उन्होंने 1967 में चौथी लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की थी। वे खैरागढ़ राजपरिवार की रानी थीं। वे छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की संस्थापक थीं।

लोकसभा चुनाव में भारी जीत दर्ज की
पद्मावती सिंह ने 1967 की लोकसभा में जीत हासिल कर इतिहास रचा। इस चुनाव में उन्हें 1 लाख 32 हजार 444 वोट मिले थे, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी रहे भाकपा के पी राय को मात्र 46004 मत मिले। पर 1971 में कांग्रेस ने पद्मावती सिंह का टिकट काट दिया। इस पर पद्मावती ने एनसीओ के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

एशिया के पहले संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना
रानी पद्मावती देवी ने बेटी राजकुमारी इंदिरा के नाम अपना महल कमल विलास पैलेस दान कर दिया। इसी महल में मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के सहयोग से एशिया के प्रथम संगीत विश्वविद्यालय के रुप में पहचान रखने वाले इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। 14 अक्तूबर 1956 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इसका उद्घाटन किया। यह संस्कृति के प्रति उनका गहरा लगाव दर्शाता है।

प्रतापगढ़ के राजा की बेटी
पद्मावती सिंह का जन्म 1918 में प्रतापगढ़ (उत्तरप्रदेश) में हुआ। वे प्रतापगढ़ के राजा प्रताप बहादुर सिंह की छोटी बेटी थीं। उनकी शिक्षा घर में ही हुई। सोलह वर्ष की उम्र में उनका विवाह खैरागढ़ के राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह के संग हुआ। पद्मावती खैरागढ़ में आरंभ से ही समाज सेवा में रुचि लेने लगीं।

नारी शिक्षा के लिए काम
महारानी ने लड़कियों को पढ़ाने के लिए राज भवन में पद्मावती पुस्तकालय की स्थापना करवाई। खैरागढ़ का 'राजा लाल बहादुर क्लब'सप्ताह में एक दिन महिलाओं के लिए आरक्षित था। उस क्लब में उनके लिए बैडमिंटन, कैरम,सिलाई-बुनाई, संगीत की व्यवस्था रहती थी। उन्होंने लड़कियों को घुड़सवारी और बंदूक चलाने का प्रशिक्षण दिलाया। गरीब छात्रों की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति का इंतजाम कराया। नारी शिक्षा के लिए उन्होंने साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की मदद ली।

प्रदेश की पहली महिला मंत्री
जवाहरलाल नेहरु और मध्यप्रदेश के मुख्यमन्त्री रविशंकर शुक्ल ने 1948 में पद्मावती देवी को राजनीति में आने के लिए उत्साहित किया। वे मध्यप्रदेश शासन की जनपद सभा खैरागढ़ की प्रथम अध्यक्ष मनोनीत की गईं। पद्मावती देवी मध्य प्रदेश की पहली महिला मंत्री थीं। वे 1952 से 1967 तक विधान सभा की सदस्य रहीं। वे 1956 से 1967 तक मध्यप्रदेश शासन के लोकस्वास्थ्य, समाज कल्याण, यांत्रिकी और नगर निकाय आदि विभागों में मन्त्री रहीं। वे इतनी लोकप्रिय थीं कि 1957 के विधान सभा चुनाव में वे वीरेन्द्र नगर से निर्विरोध चुनीं गईं।

कई भाषाओं की जानकार
पद्मावती देवी को हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, नेपाली और छत्तीसगढ़ी भाषाओं में पारंगतता थी। बाद में वे छत्तीसगढ़ी बोलने लगी थीं। वे भारत के हर प्रान्त के अलावा अमेरिका, रुस, जर्मनी, फ्रान्स,ब्रिटेन, जापान का भ्रमण कर चुकी थीं। वे बहुत से विश्वविद्यालयों की आजीवन सदस्य रहीं। वे लेडी इर्विन कॉलेज (नई दिल्ली), भारतीय महिला कान्फ्रेन्स की भी सदस्य रहीं। महारानी पद्मावती देवी का 1987 में 12 अप्रैल को निधन हो गया।

सफरनामा
1918 मे 17 जुलाई को यूपी के प्रतापगढ़ में जन्म हुआ
1934 में राजा बहादुर वीरेंद्र सिंह से उनका विवाह हुआ।
1952 में राज्य विधान सभा की सदस्य चुनीं गईं।
1956 में मध्य प्रदेश शासन में मंत्री बनीं।
1967 में राजनांदगांव से लोकसभा का चुनाव जीता।
1987 में 12 अप्रैल को उनका निधन हो गया।
 - vidyutp@gmai.com 

Friday, 3 May 2019

सरदारनी निर्लेप कौर - पेप्सू के पहले मुख्यमंत्री की बेटी पंजाब की पहली महिला सांसद

(महिला सांसद - 50 ) 


सरदारनी निर्लेप कौर 1967 में चौथी लोकसभा में अकाली दल से पंजाब के संगरुर लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। वे अकाली दल से चुनाव जीतने वाली पहली महिला सांसद थीं। उनके पिता पेप्सू प्रांत के पहले मुख्यमंत्री थे।
पटियाला के शाही घराने में जन्म
निर्लेप कौर का जन्म पटियाला के शाही घराने में 11 अगस्त 1927 को हुआ था। वे सरदार ज्ञान सिंह रारेवाला की बेटी थीं। उनकी स्कूली शिक्षा सेक्रेड हार्ट कान्वेंट लाहौर में हुई। उनका विवाह सरदार राजदेव सिंह के संग 14 मार्च 1942 को हुआ। उनके दो पुत्र और एक पुत्री हैं। उनके पिता ज्ञान सिंह रारेवाला पटियाला और इस्ट पंजाब स्टेट यूनियन ( पेप्सू) के पहले मुख्यमंत्री बने थे।
कांग्रेस से राजनीति शुरू की
निर्लेप कौर ने अपनी राजनीति कांग्रेस पार्टी के साथ शुरू की। पर उनकी कांग्रेस नेताओं से नहीं बनी और बाद में वे स्वतंत्र पार्टी में शामिल हो गईं। वे स्वतंत्र पार्टी के पंजाब प्रांत की सचिव बनाई गईं थी। स्वतंत्रता के बाद बनी इस पार्टी में ज्यादातर राजा महाराजा ही थे।
कांग्रेस उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया
बाद में निर्लेप कौर अकाली दल संत फतेह सिंह गुट में शामिल हो गईं। वे 1967 के चुनाव में संगरुर से लोकसभा मैदान में उतरीं। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार को 98 हजार से ज्यादा मतों से पराजित किया। निर्लेप कौर और मोहिंदर कौर पंजाब से लोकसभा में पहुंचने वाली पहली महिला सांसद थीं।
एसजीपीसी का चुनाव लड़ा
निर्लेप कौर पहली महिला थीं जिन्होंने सिखों की सर्वोच्च संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी, अमृतसर (एसजीपीसी) के प्रबंधक का चुनाव लड़ा। हालांकि उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली। उन्होंने 1980 में पंजाब के पायल से विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। पर वे कांग्रेस के बड़े नेता बेअंत सिंह से पराजित हो गईं।
खेती किसानी में रूचि
राजघराने से आने के बावजूद निर्लेप कौर की खेती किसानी जैसे विषयों में हमेशा रुचि रही। वे पंजाब युवक कृषक समाज की छह साल तक सचिव रहीं। वे भारत युवक समाज की पंजाब शाखा की छह साल तक सचिव रहीं। वे पटियाला की माता साहिब कौर विद्यालय की अध्यक्ष भी रहीं।
संगीत और खेलों से लगाव
निर्लेप कौर ने साठ के दशक में चंडीगढ़ के सेक्टर 4 में अपना शानदार आवास बनवाया। इसका डिजाइन 1961 में फ्रेंच वास्तुकार पियरे जेनेरे ने किया था। उनके घर में चंडीगढ़ शहर का पहला स्विमिंग पुल बना था। उनकी आंतरिक सज्जा में रुचि रही। उनकी रुचि अध्ययन, शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय और पाश्चात्य संगीत सुनने में भी रही। खेलों में उनकी पसंद गोल्फ और टेनिस रही। वे चंडीगढ़ क्लब, दिल्ली गोल्फ क्लब और जिमखाना क्लब की भी सदस्य रहीं। उन्होने ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन, नार्वे, इटली, डेनमार्क, लेबनान, हांगकांग जैसे देशों का दौरा भी किया।
सफरनामा
1927 में 11 अगस्त को पटियाला में उनका जन्म हुआ।
1942 में 14 मार्च को सरदार राजदेव सिंह के संग विवाह हुआ।
1967 में संगरूर से लोकसभा का चुनाव जीता।
1980 में पंजाब में विधानसभा का चुनाव लड़ा पर जीत नहीं मिली।
----- vidyutp@gmail.com 



Thursday, 2 May 2019

टी एस सौंदर्म - खादी और ग्रामोद्योग से गांवों की सूरत बदली

( महिला सांसद - 49 ) डॉक्टर रामचंद्रन सौंद्रम तमिलनाडु के डिंडिगुल लोकसभा क्षेत्र से1962 में कांग्रेस के टिकट पर तीसरी लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। वे तमिलनाडु के बड़े उद्योगपति और टीवीएस समूह के संस्थापक की बेटी थीं, पर उन्होंने समाज सेवा के लिए गांधीवादी मार्ग चुना। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के सामाजिक आर्थिक विकास में अपना पूरा जीवन लगा दिया। डॉक्टरी पेशे में रहते हुए उन्होंने खादी और ग्रामोद्योग से गांवों की सूरत बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।

प्रसिद्ध उद्योगपति की बेटी
 डॉक्टर सौंद्रम जन्म कन्याकुमारी के पास नगरकोविल में 18 अगस्त1904 को हुआ था। वे तमिलनाडु के जाने माने उद्योगपति और टीवीएस समूह के संस्थापक टीवी सुंदरम अयंगर की बेटी थीं। सात नवंबर 1918 को उनका विवाह हो गया था। पर पति की मृत्यु के बाद उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। उनकी पढ़ाई मद्रास यूनीवर्सिटी और लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली में हुई। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान उनका परिचय डॉक्टर सुशीला नायर से हुआ और वे गांधी जी के संपर्क में आईं।

गांधीग्राम मदुरै की स्थापना
 डॉक्टर सौंद्रम 1936 में हरिजन आंदोलन से जुड़े गांधीवादी जी रामचंद्रन के संपर्क में आईं। बापू के आशीर्वाद से 1940 में दोनों ने विवाह कर लिया। उन्होंने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया। वंचितों और पिछड़ों की सेवा के लिए उन्होंने तमिलनाडु के मदुरै में गांधीग्राम संस्थान की स्थापना की। इसके साथ ही तिरुन्वेली जिले में सेवा आश्रम की स्थापना की थी। वे पेरियार कम्युनिटी डेवलपमेंट ट्रस्ट की कार्यकारी अधिकारी रहीं। वे कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय मेमोरियल ट्रस्ट से भी जुड़ी रहीं। वे 1946 में सेंट्रल फेमिली प्लानिंग बोर्ड की सदस्य चुनीं गई थीं। वे मद्रा राज्य के खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की उपाध्यक्ष भी रहीं।


आश्रम बना विश्वविद्लाय
 सन 1947 में उन्होंने गरीबों के इलाज के लिए मदुरै डिंडिगुल मार्ग पर कस्तूरबा हास्पीटल की स्थापना की। जो बाद में विशाल अस्पताल बन गया। लोगों के चंदे से डिंडिगुल जिले के सुदूर ग्रामीण इलाकों में उन्होने कई समाजसेवा के प्रोजेक्ट शुरू किए। उनके द्वारा खोला गया आश्रम 1976 में गांधीग्राम रुरल इंस्टीट्यूट डिम्ड यूनीवर्सिटी बन चुका था।


 पहले विधायक फिर सांसद
 डॉक्टर सौंदर्म 1952 में मद्रास से कांग्रेस के टिकट पर विधायक चुनी गईं। वे दस साल विधानसभा में रहीं। वे 1962 में डिंडिगुल लोकसभा से चुनाव लड़ी तो अब्दुल कादिर को भारी अंतर से पराजित किया। वे केंद्र सरकार में शिक्षा राज्यमंत्री रहीं। शिक्षा मंत्री के तौर पर उन्होंने देश भर के कॉलेजों में राष्ट्रीय सेवा योजना की शुरुआत कराई जो आज भी संचालित हो रहा है। पर वे 1967 का चुनाव डीएमके के युवा उम्मीदवार से पराजित हो गईं। इसके बाद वे राजनीति से अलग होकर पूरी तरह समाजसेवा में सक्रिय रहीं।



डाक टिकट जारी हुआ
 भारत सरकार ने 2005 में डॉक्टर टीएस सौंद्रम की याद में 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया था। उन्होंने कस्तूरबा गांधी नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट के कामकाज को दक्षिण भारत में फैलाया। खाली समय में उन्हें घूमना और संगीत सुनना पसंद था। अपने जीवन के आखिरी दिनों में वे मदुरै के गांधीग्राम में रहती थीं।

सफरनामा

1904 में 18 अगस्त को उनका जन्म हुआ।

1918 में 14 साल की उम्र में पहला विवाह हुआ, पर पति की मृत्यु हो गई।

1940 में 7 नवंबर को उनका विवाह जी रामचंद्रन के साथ हुआ।

1962 में डिंडिगुल से सांसद चुनीं गईं।

1962 में समाजसेवा के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

1984 में 21 अक्तूबर को उनका निधन हो गया।
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Wednesday, 1 May 2019

शारदा मुखर्जी: पहले वायुसेना प्रमुख पत्नी दो बार रत्नागिरी से सांसद बनीं


( महिला सांसद - 48 ) शारदा मुखर्जी तीसरी और चौथी लोकसभा में महाराष्ट्र के रत्नागिरी से चुनाव जीत कर संसद में पहुंची। वे स्वतंत्र भारत के पहले वायुसेना प्रमुख सुब्रतो मुखर्जी की पत्नी थीं। शारदा मुखर्जी पंडित नेहरु की बहन विजयालक्ष्मी पंडित की भतीजी भी थीं। संसदीय पारी के बाद उन्होंने गुजरात और आंध्र प्रदेश के राज्यपाल के तौर पर भी काम किया।

विजयलक्ष्मी पंडित की भतीजी
शारदा पंडित का जन्म 1919 में 24 फरवरी को गुजरात के राजकोट में एक मराठी परिवार में हुआ। उनके पिता प्रताप सीताराम पंडित थे। उनकी मां सरस्वती बाई पंडित फिल्म अभिनेत्री दुर्गा खोटे की बहन थीं। नेहरू जी की बहन विजयलक्ष्मी पंडित उनकी चाची थीं। शारदा की शिक्षा कैथेड्रल गर्ल हाईस्कूल मुंबई, एलिफिंस्टन कॉलेज मुंबई और लॉ कॉलेज मुंबई में हुई। दूसरे विश्व युद्ध से पहले वायुसेना के अधिकारी सुब्रतो मुखर्जी से उन्होंने विवाह किया तो स्वतंत्र भारत के पहले एयरचीफ मार्शल बने। शारदा मुखर्जी अपने समय में ब्यूटी आइकोन मानी जाती थीं।
पति की मृत्यु के बाद राजनीति में
पति के वायुसेना में रहते हुए शारदा मुखर्जी समाजसेवा और चैरिटी की कई गतिविधियों में सक्रिय रहीं। वे भारतीय वायु सेना के चैरिटी एसोसिएशन की सदस्य रहीं। तब इंदिरा गांधी इस संगठन की अध्यक्ष थीं। वे योजना आयोग में रक्षा मामलों की अध्ययन टीम की सदस्य भी रहीं। टोकियो में 1960 में पति की मृत्यु के बाद वे शारदा मुखर्जी राजनीति में सक्रिय हुईं।
दो बार संसद में
कांग्रेस पार्टी ने उन्हें महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के रत्नागिरी लोकसभा से 1962 में टिकट दिया। यहां शारदा मुखर्जी ने अच्छी जीत दर्ज की। उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के अर्जुन विचारे को हराया था। वे 1967में एक बार फिर रत्नागिरी लोकसभा क्षेत्र से ही चुनीं गईं। इस बार उन्होंने जनसंघ के आरवी कालसेकर को हराया। रत्नागिरी का इलाका अलफांसो आम और काजू की खेती के लिए प्रसिद्ध है। सांसद के तौर पर नेशनल शिपिंग बोर्ड, रक्षा मामलों की सलाहकार समिति, राष्ट्रीय लघु बचत योजना सलाहकार बोर्ड की सदस्य रहीं। उन्होंने इन बोर्ड में कई महत्वपूर्ण सलाह भी दिए।

आंध्र और गुजरात की राज्यपाल
1967 में कांग्रेस के विभाजन के बाद वे कांग्रेस ओ में चली गईं। बाद में उनका झुकाव जनता पार्टी की ओर हो गया। शारदा मुखर्जी 1977में देश में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद 5 मई को आंध्र प्रदेश की राज्यपाल नियुक्त किया गया। एक साल बाद उनका तबादला गुजरात के राज्यपाल के तौर पर कर दिया गया। वे 1983तक गुजरात प्रदेश की राज्यपाल रहीं। दुनिया के कई देशों का दौरा कर चुकी शारदा मुखर्जी अखबारों में रक्षा मामलों पर लिखा करती थीं।
सफरनामा
1919 में 24 फरवरी को शारदा पंडित का जन्म गुजरात के राजकोट में हुआ।
1939 में सुब्रतो मुखर्जी के संग उनका विवाह हुआ।
1962 और 1967 में रत्नागिरी से लोकसभा का चुनाव जीता।
1977 में आंध्र प्रदेश की राज्यपाल नियुक्त की गईं।
1978 से 1983 तक गुजरात की राज्यपाल रहीं।
2007 में मुंबई में उनका निधन हो गया।