Monday, 18 March 2019

राजमाता कमलेंदुमति शाह - महिला और बाल विकास की आवाज बनीं


( महिला सांसद 08 ) - उत्तराखंड के टिहरी राजपरिवार की राजमाता कमलेंदुमति शाह पहली लोकसभा की सदस्य थीं। उन्होंने 1951 का पहला चुनाव गढवाल, बिजनौर लोकसभा क्षेत्र से स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर जीता था। राजमाता कमलेंदुमति शाह ने उन सांसदों में से थी जिन्होंने अपनी सतत सक्रियता से लोकसभा की शोभा बढ़ाई।
संसद में निजी विधेयक लाईं
राजमाता कमलेंदुमति शाह पहली लोकसभा के काफी सक्रिय सांसदों में शामिल थीं। महिला और बाल विकास उनकी रूचि के विषय थे। वे महिला एवं बाल संस्थाएं (लाइसेंसिंग) विधेयक-1954 संसद में लेकर आई थी। यह उनकी ओर से पेश निजी विधेयक था जिस पर चर्चा हुई। हालांकि आजकल संसद में निजी विधेयकों की परंपरा कम हो गई है।
कांग्रेस उम्मीदवार को पराजित किया
टिहरी रियासत के इतिहास के जानकार महिपाल सिंह नेगी बताते हैं कि 1949 में टिहरी का भारतीय संघ मे विलय के बाद तत्कालीन राजा नरेंद्र शाह की मृत्यु हो गई। तबराजघराने के सलाहकारों ने राजा के उत्तराधिकारी मानवेंद्र शाह को चुनाव लड़ने की सलाह दी। लेकिन मानवेंद्र शाह का पर्चा खारिज हो गया। इसके बाद रानी कमलेंदुमति शाह को निर्दलीय चुनाव मैदान में उतारा गया। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी कृष्णा सिंह को13,982 मतों से पराजित कर जीत दर्ज की। 
शिक्षा जगत में योगदान
कमलेंदुमति की शिक्षा राजमहल में ही हुई थी। पर उन्हें हिंदी अंग्रेजी और फ्रेंच का अच्छा ज्ञान था। महाराजा नरेंद्रशाह ट्रस्ट की स्थापना की। राज्य की अनाथ, बेसहारा और विधवा महिलाओं के लिए स्कूल खोला। अन्धे और वृद्धों के लिए अंध और वृद्ध विद्यालय की स्थापना की। बालिकाओं की शिक्षा के लिए माध्यमिक विद्यालय और महाविद्यालय खुलवाए। टिहरी में एक शानदार भवन का निर्माण कर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन से भवन का उद्घाटन करवाया। उनकी सारी शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियां इसी भवन से संचालित की जाती थीं।
टिहरी के विकास की चिंता
राजमाता कमलेन्दुमति सरकार द्वारा टिहरी की उपेक्षा पर चिन्ता रहती थी। अकालग्रस्त गढ़वाल में ज्वार-बाजरा भेजने पर उन्होंने अपना विरोध दर्ज कराया और घटिया अनाज की आपूर्ति बंद करवाई। वे गढ़वाली भाषा की हिमायती थीं। किसी के गढ़वाली होते हुए भी हिंदी में बात करने वालों से वह नाराज हो जाती थीं।
बांध का विरोध
प्रारंभ से ही राजमाता ने टिहरी में गंगा नदी पर बांध बनाए जाने का विरोध किया था। वे नदियों पर बड़े बांध विरोधी थीं। खेल में क्रिकेट में उनकी रूचि थी। वे क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया की सदस्य रहीं। जीवन के आखिरी दिनों में वे नरेंद्र नगर के राजमहल में रहती थीं।

सफरनामा
1903 में 20 मार्च को हिमाचल प्रदेश के क्योंथल राजघराने में जन्म हुआ।
1916 में टेहरी के महाराजा सर नरेंद्र शाह से उनका विवाह हुआ।
1952 में टिहरी गढ़वाल-बिजनौर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर संसद में पहुंची।  
1958 में उनके कार्यों के लिए भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया।
1999 में 15 जुलाई को मस्तिष्क कैंसर से उनका निधन हो गया।


Sunday, 17 March 2019

गरीबों और दलितों की हमदर्द मिनीमाता


( महिला सांसद - 07 ) मिनीमाता छत्तीसगढ़ की पहली महिला सांसद थीं। समाज का पिछड़ापन दूर करने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। छुआछूत मिटाने के लिए उन्होंने इतना काम किया कि मिनी माता को लोग मसीहा के रुप में देखा करते थे। मिनीमाता ने अलग छत्तीसगढ़ राज्य का मुखर समर्थन किया था।

छत्तीसगढ़ की रातमाता
वह किसी राजघराने से नहीं आती थीं पर छतीसगढ़ की जनता उन्हें राजमाता जैसा सम्मान देती है। छत्तीसगढ़ सरकार उनके सम्मान में हर साल महिलाओं के विकास के क्षेत्र में काम करने वालों को मिनीमाता सम्मान देती है। छत्तीसगढ़ का विधानसभा भवन उनके नाम पर बना है। छत्तीसगढ़ के लोग हर साल पुण्य तिथि पर मिनीमाता के सदकार्यों को याद करते हैं।

पीड़ित मानवता की सेवा
वे 1952, 1957, 1962, 1967 और 1971  में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर सांसद चुनी गईं। संसद में अस्पृश्यता विधेयक को पास कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाल विवाह, दहेज प्रथा दूर करने के लिए आवाज उठाई तो गरीबी और अशिक्षा दूर करने के लिए काम करती रहीं। अनाथ और पीड़ितों की सेवा करना उनके जीवान का प्रमुख लक्ष्य रहा। उन्होंने छत्तीसगढ़ में सिंचाई के लिए हंसदेव बांध का निर्माण कराया। छत्तीसगढ़ के लोग उनको आज भी बड़े सम्मान से याद करते हैं।
गुरु घासी दास की बहू
मिनीमाता का जन्म 1913 में असम के नौगांव में हुआ था। उनकी मूल नाम मीनाक्षी देवी था। छत्तीसगढ में 1901 से 1910 के बीच पड़े भीषण अकाल के दौरान उनके परिवार के लोगों को असम के चाय बगान में मजदूरी के लिए जाना पड़ा था। रेलगाड़ी से असम जाते समय उनकी दो बहनें ट्रेन में ही चल बसीं थीं। उनका बचपन काफी गरीबी में गुजरा। उनका विवाह छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ के महान संत गुरुघासी दास से पुत्र गुरु अगम दास के संग हुआ था।
पांच बार संसद में
मिनीमाता के पति गुरु अगमदास आजादी के आंदोलन में सक्रिय थे। पर 1951 में उनका अचानक देहांत हो गया। इसके बाद उनकी विरासत मिनीमाता ने संभाली। पहली लोकसभा में वे बिलासपुर दुर्ग रायपुर लोकसभा से जीतकर पहुंची। दूसरी लोकसभा में बोदला बाजार से निर्वाचित होकर संसद में पहुंची। 1971 में उन्होंने अपने जीवन का आखिरी चुनाव जांजगीर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीता था।

गरीबों दलितों की हमदर्द
मिनीमाता हमेशा गरीबों और दलितों की मदद के लिए तैयार रहती थीं। संसद से लेकर सड़क तक उन्होने इसके लिए आवाज उठाई। वे छत्तीसगढ़ मजदूर कल्याण संगठन, भिलाई की संस्थापक थीं। जब वे सांसद के रुप में दिल्ली में रहती थीं तो उनका वास स्थान एक धर्मशाला जैसा था। छत्तीसगढ़ से जो कोई भी दिल्ली में आता, वह निर्जिंश्चत रहता कि मिनी माता का निवास तो है। मिनीमाता को असमिया, हिंदी, छ्तीसगढ़ी और अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान था।

सफरनामा
1913 में 15 मार्च को असम के नौगांव में जन्म हुआ
1930 में 2 जुलाई को उनका विवाह गुरु अगम दास के संग हुआ।
1952 में पहली बार लोकसभा की सदस्य चुनीं गई।
1957, 1972 और 1967 में भी लोकसभा का चुनाव जीता।
1972 में 11 अगस्त को भोपाल से दिल्ली जाते हुए विमान हादसे में उनका निधन हो गया



Saturday, 16 March 2019

खादी और गांधीवाद के प्रति समर्पित रहीं मणिबेन


( महिला सांसद 06) - मणिबेन पटेल सरदार वल्लभभाई पटेल की बेटी होने के साथ एक स्वतन्त्रता सेनानी और पहली लोकसभा सदस्य थीं। वे चार बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा की सदस्य रहीं। पर मणिबेन ने अपने पूरा जीवन अत्यंत सादगी से जीया और वे स्वदेशी, खादी और गांधीवाद के प्रति समर्पित रहीं। सांसद के अलावा वे गुजरात प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में भी सक्रिय रहीं। 1957 से चार साल तक गुजरात प्रदेश कांग्रेस की सचिव और बाद में उपाध्यक्ष रहीं।

सांसद के तौर पर पारी
1952 का लोकभा चुनाव उन्होने गुजरात के खेड़ा (दक्षिण) लोकसभा क्षेत्र से जीता था। तब यह इलाका बांबे प्रांत का हिस्सा था। वे 1957 में एक बार फिर आनंद से लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। बाद उनकी कांग्रेस पार्टी से दूरियां बन गईं। वे 1973-77 में पांचवी लोकसभा की भी सदस्य रहीं। उन्होंने 1977 में छठी लोकसभा का चुनाव गुजरात के मेहसाणा लोकसभा क्षेत्र से जनता पार्टी के टिकट पर जीता।
स्वतंत्रता आंदोलन में
मणिबेन पटेल का जन्म 3 अप्रैल 1903 को गुजरात के करमसप नामक स्थान में हुआ था। मणिबेन की शिक्षा-दीक्षा मुम्बई में हुई थी। महात्मा गांधी की शिक्षाओं से प्रभावित होकर शिक्षा के बाद वे 1918 के बाद से अहमदाबाद स्थित गांधीजी के आश्रम में ही रहकर राष्ट्र सेवा में जुट गईं। छह साल की उम्र में अपनी मां को खो चुकी मणिबेन अपने पिता के साथ देश के काम में जुट गईं। उन्होने असहयोग आन्दोलन और नमक सत्याग्रह में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। कई बार जेल गईं।
पिता की छत्रछाया में
1930 के दशक में मणिबेन अपने पिता का दायां हाथ बन गईं थीं। वह उनके दिनचर्या का ध्यान रखतीं। उनके साथ लगभग हर जगह जातीं। अपने पिता के हर काम का नोट बनाकर अपनी डायरी में रखतीं। वे हमेशा इस बात का ध्यान रखती थीं कि उनके पिता जो भी कपड़े पहन रहे हों वो उनके अपने चरखे पर ही काते हुए हों। जब 1928 में बारडोली सत्याग्रह हुआ तो  उसमें औरतें जुड़ने से कतरा रही थीं। तब मणिबेन ने मिठूबेन पेटिट और भक्तिबा देसाई के साथ मिलकर महिलाओं को इस आन्दोलन से जोड़ा।
गजब की इमानदार महिला
मणिबेन 1950 में सरदार पटेल की मृत्यु के बाद भी राजनीति में सक्रिय बनी रहीं। भारत में दुग्ध क्रांति के जन्मदाता वी कुरियन लिखते हैं - मणिबेन पटेल, सरदार पटेल की बेटी, गजब की ईमानदार और वफादारी निभाने वाले महिला थीं।
इमरजेंसी में जेल गईं
मणिबेन गुजरात प्रदेश कांग्रेस की सचिव और उपाध्यक्ष भी रहीं। सन 1975 में जब इमरजेंसी लगी तो नारेबाजी के आरोप में उन्हें जेल में डाल दिया गया था। सन 1990 में मणिबेन का गुमानामी में निधन हो गया।

मणिबेन ताउम्र सामाजिक कार्यो में भी सक्रिय रहीं। वे 1976-77 में गुजरात विद्यापीठ काउंसिल, नवजीवन ट्रस्ट, महादेव देसाई मेमोरियल ट्रस्ट, बारडोली स्वराज आश्रम ट्रस्ट, सरदार वल्लभ भाई पटेल समाजसेवा ट्रस्ट के सदस्य के तौर पर सक्रिय रहीं। वे खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड की भी सदस्य रहीं।
सफरनामा
1903 में तीन अप्रैल को करमसाद (आनंद) गुजरात में मणिबेन का जन्म हुआ।
1990 में मणिबेन पटेल का निधन हो गया।
1925 में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गईं।
1952 और 1957 में पहला और दूसरा लोकसभा का चुनाव जीता।
1964 से 1970 तक राज्यसभा की सदस्य रहीं।
1969 में कांग्रेस ओ में शामिल हो गईं
1975 में इमरजेंसी के दौरान सत्याग्रह में हिस्सा लिया और जेल गईं।
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Friday, 15 March 2019

तारकेश्वरी सिन्हा - पहली महिला वित्त राज्यमंत्री

(महिला सांसद 05 ) 
तारकेश्वरी सिन्हा पहली लोकसभा में 1952 में पटना पूर्वी लोकसभा से कांग्रेस से टिकट पर चुनाव जीत कर पहुंची थी।
बिहार से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली कार्यकर्ता महज26 वर्ष की आयु में 1952 में वे पटना पूर्व निर्वाचन क्षेत्र से जीतकर संसद में पहुंची। वे पहली लोकसभा के सबसे युवा चेहरों में शुमार थीं। पहली लोकसभा में वे ग्लैमर गर्ल ऑफ पार्लियामेंट थीं। राजनीति की गहरी समझ रखने वाली तारकेश्वरी सिन्हा लोकसभा में जब बोलना शुरू करतीं तो पूरी संसद शांत होकर उन्हें सुनती थी। उनके अंदाजे बयां में हमेशा शेरो-शायरी का पुट रहता था।
देश की पहली वित्त राज्य मंत्री
1958 से 1964 तक नेहरु जी के कैबिनेट में वे वित्त राज्य मंत्री रहीं। वित्तममंत्रालय में काम करने वाली वे पहली महिला मंत्री थीं।
पटना के सर्जन की बेटी
तारकेश्वरी सिन्हा के पिता शिवनंदन प्रसाद सिंह पटना के जानेमाने सर्जन थे। वे उनकी अकेली पुत्री थीं। उनके पति निधिदेव सिंह तब के देश के प्रसिद्ध वकील थे और राज्य सरकार के मुकदमे लड़ते थे। शादी के बाद वे कुछ समय कोलकाता में रहीं। बाद में उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से राजनीति विज्ञान में उच्च शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद भारत लौटने पर वे राजनीति में सक्रिय हो गईं।
भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय
कॉलेज में पढाई के दौरान ही वह पटना में छात्र राजनीति में सक्रिय हो गईं। महज 19-20 साल की उम्र में वे बिहार की बड़ी छात्र नेता के रूप में उभरीं।  इसके बाद 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर वे 1957, 1962 और 1967 में बाढ़ से जीतीं। सन 1969 में कांग्रेस में विभाजन होने पर वे मोरारजी देसाई के खेमे में चली गईं। 1971 में उन्होंने कांग्रेस ओ के टिकट पर बाढ से चुनाव लड़ा पर हार गईं। बाद में वे कांग्रेस में वापस आ गईं। वे 1977 में बेगुसराय से कांग्रेस के टिकट पर लड़ी पर जनता लहर में पराजित हो गईं।
लेखिका और शायरी
तारकेश्वरी सिन्हा हिंदी और अंग्रेजी धारा प्रवाह बोलती थीं। जीवन पर्यंत पत्र पत्रिकाओं के लिए लेखन में सक्रिय रहीं। सार्वजनिक मंच पर भाषणों के दौरान वे शेरो-शायरी की झड़ी लगा देती थीं। उन्हे हजारों शेर जुबानी याद थे। एक बार गुलजार ने कहा था कि उनकी फिल्म आंधी में जो चरित्र है वह तारकेश्वरी सिन्हा से प्रेरित था। उन्हें टेनिस बैडमिंटन और कैरम खेलना पसंद था।
तारकेश्वरी सिन्हा ने 1980 के बाद राजनीति से संन्यास ले लिया पर समाज सेवा और सार्वजनिक जीवन में पूरी ऊर्जा से वे सक्रिय रहीं।
सफरनामा
1926 में 26 दिसंबर को उनका जन्म पटना में हुआ
1943 में वकील निधिदेव सिन्हा से विवाह हुआ।
1957 और 1962 में लोकसभा का चुनाव बाढ़ से जीता। 
1952 से 1957 तक संसद की लोक लेखा समिति की सदस्य रहीं।
2007 में 14 अगस्त को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया।
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Thursday, 14 March 2019

सुशीला नायर – जन स्वास्थ्य के प्रति समर्पित नाम


( महिला सांसद 04 ) 
पेशे से डॉक्टर और महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की निकट सहयोगी डॉक्टर सुशीला नायर चार बार सांसद रहीं। दूसरी, तीसरी और चौथी लोकसभा में 1957 में उत्तर प्रदेश के झांसी से चुनाव जीत कर पहुंची। एक बार फिर 1977 में उन्होंने झांसी से ही जनता पार्टी से लोकसभा का चुनाव जीता। केंद्र सरकार में वे 1962 से 1967 के बीच स्वास्थ्य मंत्री रहीं।
एक डॉक्टर ने जब राजनीति पारी शुरू की तो उनका लक्ष्य हमेशा देश में जन स्वास्थ्य की सुविधाएं बेहतर बनाने को समर्पित रहा। वर्धा, झांसी समेत देश में कई पिछले इलाकों में अस्पतालों की स्थापना उनके नेतृत्व में हुई। फरीदाबाद में उन्होंने ट्यूबरक्लोसिस सेनेटोरियम की स्थापना करवाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की प्रेरणा से उन्होंने वर्धा के महात्‍मा गांधी इंस्‍टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज से पढ़ाई करने वाले डॉक्टरों को ग्रामीण क्षेत्र में जाकर काम करने के लिए प्रेरित किया।
पहले दिल्ली की सियासत में
स्वतंत्रता के बाद डॉक्टर सुशीला नायर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सियासत में सक्रिय हुईं। 1952 में विधानसभा का चुनाव जीता। तब वे राष्ट्रीय राजधानी की राजनीति का प्रमुख चेहरा थीं। वे मुख्यमंत्री पद की दावेदार थीं पर उन्हें दिल्ली की पहली सरकार में स्वास्थ्य मंत्री का पद मिला। बाद में वे दिल्ली विधानसभा की अध्यक्ष भी बनीं।
सेवाग्राम में बापू के साथ
डॉक्टर सुशीला नायर बापू के निजी सचिव प्यारेलाल नायर की छोटी बहन थीं। लेडी हार्डिंग कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद 1939 में वे अपने भाई प्यारेलाल से मिलने जब वे सेवाग्राम पहुंची, इसी दौरान इलाके में इलाके में हैजा फैला था। वहां सुशीला नायर ने बतौर डाक्टर बड़े मनोयोग से काम किया। 
बापू की निजी चिकित्सक
डॉक्टर विधानचंद्र राय की सलाह पर सुशीला ने महात्मा गांधी और कस्तूरबा के चिकित्सक का दायित्व संभाला। 1942 में वे एमडी डिग्री लेकर सेवाग्राम लौटीं तो आगे हमेशा बापू के साथ ही रहीं। सुशीला नायर के लिए गांधी उनके जीवन का केंद्र रहे। जब 1948 में बापू की हत्या हुई तब मनुबेन और सुशीला नायर उनके साथ थीं।
दिल में बसता था झांसी
सुशील नायर ने लोकसभा में चार बार यूपी के बुंदेलखंड इलाके के झांसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। झांसी में महारानी लक्ष्मी बाई मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल की स्थापना उनके प्रयासों से ही संभव हो सका। 16 दिसंबर 1965 को उन्होंने इस मेडिकल कॉलेज अस्पताल की आधारशिला रखी थी।
सफरनामा
1914 में 26 दिसंबर को सुशीला नायर का जन्म कुंजाह ( अब पाकिस्तान) में हुआ। वे आजीवन अविवाहित रहीं।
1942 से 1944 तक वे बापू और कस्तूरबा के साथ पुणे के आगा खां पैलेस में नजरबंद रहीं।
1950 में उनकी पुस्तक कारावास की कहानी के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार मिला।
1952 से 1956 तक दिल्ली विधानसभा की सदस्य रहीं।
1957 और 1962 और 1967 में झांसी से लोकसभा चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीता।
1977 में छठी लोकसभा चुनाव उन्होंने एक बार फिर झांसी से जनता पार्टी के टिक पर जीता।
1945 में सुशीला नायर ने वर्धा में कस्तूारबा हॉस्पिटल की स्था पना की। जो अब महात्माज गांधी इंस्टीनट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज में तब्दील हो चुका है।
1948 में गांधी जी की हत्याध के बाद सुशीला अमेरिका चली गईं। वहां से पब्लिक हेल्थम की डिग्री हासिल की।
1952 -1955 दिल्ली सरकार में स्वास्थ्य और परिवहन मंत्री रहीं
1955-56 में दिल्ली विधानसभा की अध्यक्ष बनीं।
1962-64 केंद्र सरकार में स्वास्थ्य, स्थानीय निकाय शहरी विकास मंत्री रहीं
1964 से 1967 – केंद्र सरकार में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री।
2001 में 3 जनवरी को उनका निधन हो गया।


Wednesday, 13 March 2019

सुचेता कृपलानी – देश की पहली महिला मुख्यमंत्री


( महिला सांसद -03 ) 
गरीबों-महिलाओं की हमदर्द
सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने से पहले लगातार दो बार लोकसभा के लिए चुनी गई। उनके नाम देश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने का कीर्तिमान है वह भी आबादी में सबसे बड़े राज्य का। वे गरीबों और महिलाओं के प्रति काफी हमदर्द थीं। सांसद और विधायक के तौर पर वे अपने क्षेत्र के लोगों के लिए पूरा समय निकालती थीं। वे समस्याओं को टालने के बजाय तुरंत निपटाने पर जोर देती थीं।
तीन बार संसद में
सुचेता 1952 और 1957 में लगातार नई दिल्ली लोकसभा से चुनाव जीतकर संसद में पहुंची। पहला चुनाव उन्होंने किसान मजदूर प्रजा पार्टी से जीता था। बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गईं। नेहरु मंत्रीमंडिल में लघु उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री रहीं। वे 1967 में एक बार फिर गोंडा लोकसभा चुनाव जीत कर संसद में पहुंची।

स्वतंत्रता आंदोलन में
सुचेता ने अरुणा असफ अली और उषा मेहता के साथ भारत छोडो आन्दोलन में हिस्सा लिया था। सुचेता ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लड़कियों को ड्रिल करना और लाठी चलाना सिखाया। सन 1942 में सारे बड़े नेताओं के जेल चले जाने पर उन्होंने अंडरग्राउंड रहकर आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे बापू की करीबी थीं। नोवाखाली यात्रा में भी वह बापू के साथ रहीं।

दिल से कोमल, शासन में कठोर
सुचेता दिल की कोमल तो थीं, लेकिन प्रशासनिक फैसले लेते समय वह दिल नहीं दिमाग की सुनती थीं। उनके यूपी के मुख्यमंत्रित्व काल में राज्य के कर्मचारियों ने लगातार 62 दिनों तक हड़ताल जारी रखी,लेकिन वह कर्मचारी नेताओं से सुलह को तभी तैयार हुई, जब उनके रुख में नरमी आई। उनके निधन पर शोक संदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा, सुचेता जी ऐसे दुर्लभ साहस और चरित्र की महिला थीं,जिनसे भारतीय महिलाओं को सम्मान मिलता है।

जेबी कृपलानी से विवाह
अंबाला में एक बंगाली परिवार में जन्मी सुचेता मजुमदार ने समाजवादी नेता और हैदराबाद (पाकिस्तान) में पैदा हुए जेबी कृपलानी से विवाह किया। सुचेता और जेबी कृपलानी दोनों ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर रहे। इसी दौरान दोनों का परिचय हुआ। बाद में बापू के आश्रम में जाकर उनका प्रेम परवान चढ़ा और उन्होंने तमाम पारिवारिक विरोध के बावजूद विवाह कर लिया। सुचेता कांग्रेस में रहीं जबकि उनके पति सोशलिस्ट पार्टी में। पर दोनों के रिश्ते जीवन पर सौहार्दपूर्ण रहे।

सफरनामा
1908 में अंबाला में जन्मी सुचेता कृपलानी की शिक्षा लाहौर और दिल्ली में हुई।
1946 में वह संविधान सभा की सदस्य चुनी गई।
1950 से 1952 तक प्रोविजनल लोकसभा की सदस्य रहीं।
1952, 1957 और 1967 में लोकसभा का चुनाव जीता।
1958 से 1960  तक वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की महासचिव रहीं।
1962 में मेंहदावल (संत कबीरनगर) से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए निर्वाचित।
1963 से 1967 तक वह उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं।
1974 में एक दिसंबर को उनका निधन हो गया।

गांधी जी ने किया था विवाह का विरोध
सुचेता मजुमदार और जेबी कृपलानी की उम्र में 20 साल का अंतर था। सुचेता ने अपनी किताब 'सुचेता एन अनफिनिश्ड ऑटोबॉयोग्राफी'में लिखा है कि गांधीजी ने उनके विवाह का विरोध किया था। बापू को लगता था कि पारिवारिक जिम्मेदारियां उन्हें आज़ादी की लड़ाई से विमुख कर देंगी। गांधी ने कृपलानी से कहा, अगर तुम उससे शादी करोगे तो मेरा दायां हाथ तोड़ दोगे। तब सुचेता ने उनसे कहा, वह ऐसा क्यों सोचते हैं बल्कि उन्हें तो ये सोचना चाहिए कि उन्हें आज़ादी की लड़ाई में एक की बजाए दो कार्यकर्ता मिल जाएंगे। 



Tuesday, 12 March 2019

विजय लक्ष्मी पंडित - महिलाओं को संपत्ति में अधिकार दिलाया


( महिला सांसद -02 ) विजय लक्ष्मी पंडित भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की बहन थीं। वे नेहरु जी से 11 साल छोटी विजय लक्ष्मी का जन्म प्रयागराज के आनंद भवन में हुआ।

वे पहली लोकसभा में 1952 लखनऊ सेंट्रल से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीत कर पहुंची। 1964 में नेहरु जी के निधन के बाद उन्होंने फूलपुर से लोकसभा का उपचुनाव जीता। वे 1967 में भी फूलपुर से निर्वाचित हुईं। देश के स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी रही।

अधिकारों के लिए संघर्ष
विजय लक्ष्मी पंडित ने अपने जीवन में महिलाओं का अधिकार दिलाने के लिए बहुत संघर्ष किया। उनकी ही मेहनत से आजादी के बाद महिलाओं को अपने पति और अपने पिता की सम्पत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त हो सका।

आंदोलन और जेल
उनकी शुरुआती शिक्षा मुख्य रूप से घर में ही हुई थी। उनका विवाह 1921 में काठियावाड़ के सुप्रसिद्ध वकील सीताराम पंडित से हुआ। गांधीजी से प्रभावित होकर उन्होंने भी आजादी के लिए आंदोलन में हिस्सा लेना शुरू किया। वह हर आन्दोलन में आगे रहते हुए कई बार जेल भी गईं। आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 1932 में गिरफ्तार भी किया गया।
ब्रिटिश राज में मंत्री बनीं
ब्रिटिश राज के दौरान किसी कैबिनेट पद पर पहुंचने वाली प्रथम महिला विजयलक्ष्मी पंडित ही थीं। 1937 में उनका निर्वाचन यूनाइटेड प्रॉविंसेज के विधानमंडल में हुआ। उन्हें स्थानीय स्वप्रशासन एवं जन-स्वास्थ्य विभाग में मंत्री बनाया गया। वे 1939 तक और बाद में 1946 से 1947 तक इस पद पर रहीं। विजय लक्ष्मी पंडित भारत की संविधान सभा की सदस्य भी थीं। उन्होंने 1952 में चीन जाने वाले सद्भावना मिशन का भी नेतृत्व किया।
कई देशों में भारत की राजदूत
वर्ष 1945 में विजयलक्ष्मी पंडित अमेरिका गईं और अपने भाषणों के द्वारा उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में जोरदार प्रचार किया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 'संयुक्त राष्ट्र संघ' में भारत के प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया। वे संघ में महासभा की प्रथम महिला अध्यक्ष निर्वाचित की गईं। उन्होंने रूस, अमेरिका, मैक्सिको, आयरलैण्ड और स्पेन में भारत के राजदूत और इंग्लैण्ड में हाई कमिश्नर के पद पर कार्य किया।

द स्कोप ऑफ हैप्पीनेस
'द स्कोप ऑफ हैप्पीनेस-ए-पर्सनल मेमोएर' विजयालक्ष्मी पंडित की आत्मकथात्मक पुस्तक है। विजयलक्ष्मी ने 1952 में ग्रामीण सभ्यता व संस्कृति से परिचय हेतु राजस्थान के बाडमेर जिले के सांस्कृतिक गांव बिसाणिया में 'मालाणी डेलूओं की ढाणी' का ऐतिहासिक दौरा किया था।
बाद में कांग्रेस की आलोचक
अपने आखिरी दिनों में वे केन्द्र की कांग्रेस सरकार की नीतियों की आलोचना करने लगी थीं। विजयलक्ष्मी आपातकाल के दौरान खुलकर इनके विरोध में आ गई थीं। उन्होंने इंदिरा के इस कदम को लोकतांत्रिक देश के लिए एक काला दिन बताया था।


-    सफरनामा -
1900 में 18 अगस्त को इलाहाबाद के आनंद भवन में जन्म हुआ।  
1921 में सीताराम पंडित से उनका विवाह हुआ।
1940 से 1942 अक वे ऑल इंडिया वूमेन्स कान्फ्रेंस के अध्यक्ष के पद पर रहीं।
1949 से 1951 तक संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत की राजदूत रहीं।
1946 से 1968 के मध्य उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया।
1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा का अध्यक्ष चुना गया। वे इस पद पर आसीन होने वाली विश्व की प्रथम महिला थीं।
1958 में उनकी पुस्तक द इवॉल्यूशन ऑफ इंडिया प्रकाशित हुई।
1962 से 1964 तक वे महाराष्ट्र के राज्यपाल के पद रहीं।
1967 में फूलपुर लोकसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीता।
1979 में उन्हें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत का प्रतिनिधि नियुक्त किया गया।
1990 में एक दिसंबर को देहरादून में उनकी मृत्यु हुई।


Monday, 11 March 2019

देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री - राजकुमारी अमृत कौर


(महिला सांसद - 01 ) 
सन 1951-52 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में कुल 24 महिलाएं चुनाव जीत कर आईं उनमें राजकुमारी अमृत कौर प्रमुख थीं। प्रख्ता गांधीवादी, स्वतंत्रता सेनानी राजकुमारी अमृत कौर को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने मंत्रीमंडल में स्वास्थ्य मंत्री बनाया था। वे पहले संसदीय चुनाव में हिमाचल प्रदेश के मंडी-महासू लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीत कर आई थीं।

राजकुमारी अमृत कौर पंजाब के कपूरथला के राजा हरनाम सिंह की बेटी थीं। वे अपने सात भाइयों की एक मात्र बहन थीं। राजकुमारी इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से एमए पास कर भारत लौटीं तो स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गईं। महलों में पलीं अमृत कौर ने महात्मा गांधी के प्रभाव में आने के बाद सादगी भरा जीवन अपना लिया। 1934 से वे बापू के आश्रम में जाकर रहने लगी थीं। उन्होंने लंबे समय तक बापू के सचिव के तौर पर भी काम किया।


देश के पहले स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर उन्होंने कई उल्लेखनीय कार्य किए। देश में मलेरिया खत्म करने के लिए अभियाना चलाया। तब एशियाई देशों में मलेरिया बड़ी बीमारी थी जिससे हर साल लाखों लोगों की मौत हो रही थी। 1952 में उनकी अगुवाई में बाल कल्याण के लिए अग्रणी संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ चाइल्ड वेलफेयर की स्थापना हुई। वे ट्यूबरक्यूलोसिस एसोसिएशन ऑफ इंडिया और हिंद कुष्ठ निवारण संघ की आरंभ से अध्यक्ष रहीं।


राजकुमारी जीवन पर्यंत सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं। वे गांधी स्मारक निधि और जलियांवाला बाग नेशनल मेमोरियल ट्रस्ट की ट्रस्टी रहीं। कौंसिल ऑफ साइंटिफिक तथा इंडस्ट्रियल रिसर्च की शासी निकाय की सदस्य रहीं। वे दिल्ली म्यूजिक सोसाइटी की भी अध्यक्ष रहीं।


संगीत के अलावा राजकुमारी को खेलों से बड़ा प्रेम था। नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ इंडिया की स्थापना इन्होंने की थी और इस क्लब की वह शुरू से अध्यक्ष रहीं। उन्हें टेनिस खेलने का खूब शौक था।

शाकाहारी और बच्चों से प्रेम
राजकुमारी को फूलों से और बच्चों से बड़ा प्रेम था। खानपान में वे विशुद्ध शाकाहारी थीं। बाइबिल के अतिरिक्त वे रामायण और गीता को भी प्रतिदिन पढ़ती थीं।1957 से 1964 तक राजकुमारी राज्य सभा की सदस्य रहीं। अपने जीवन के आखिरी दिनों में शिमला के समरहिल में रहा करती थीं। 1964 में 2 अक्तूबर को दिल्ली में उनकी मृत्यु हुई। वे कैथोलिक ईसाई परिवार से आती थीं पर उनकी इच्छा के अनुसार उनको दफनाया नहीं गया, बल्कि दिल्ली में यमुना तट पर जलाया गया।

सफरनामा

1889 में 2 फरवरी को लखनऊ के कपूरथला हाउस में राजकुमारी अमृत कौर का जन्म हुआ।
1945 में में यूनेस्को की लंदन बैठक में शामिल होने वाले प्रतिनिधि मंडल में राजकुमारी अमृत कौर उपनेत्री थी।

1947 से से 1957 तक वह भारत सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहीं।

1948 और 1949 में वह ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस ऑफ सोशल वर्क की अध्यक्ष रहीं।

1948 से 1964 तक वे सेंट जॉन एंबुलेंस ब्रिगेड की चीफ कमिशनर रहीं।

1950 में वह वर्ल्ड हेल्थ असेंबली की अध्यक्ष निर्वाचित हुई।

1950 से 1964 तक वह लीग ऑफ रेडक्रॉस सोसाइटीज की सहायक अध्यक्ष रहीं।

1957 में दिल्ली में उन्नीसवीं इंटरनेशनल रेडक्रास कॉन्फ्रेंस राजकुमारी की अध्यक्षता में हुई।


गांधी बुलाते थे इडियट

राजकुमारी अमृत कौर पर महात्मा गांधी के कई खत मिलते हैं। इनमें बापू स्नेह से राज कुमारी को इडियट लिखते हैं। तो कभी स्ट्यूपिड ( बेवकूफ) या बागी लिखते हैं। ऐसे खत में खुद को तानाशाह भी लिखते हैं। दिल्ली के लाजपत नगर इलाके में उनके नाम पर राजकुमारी अमृतनगर कॉलेज ऑफ नर्सिंग की स्थापना की गई है।

स्कूल में हॉकी टीम की कप्तान

ब्रिटेन के शेरबोर्न स्कूल में पढ़ाई के दौरान वे अपने स्कूल की हेड गर्ल थी। वे स्कूली जीवन में हॉकी की कप्तान भी थीं। 1918 में जब वे ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई करके लंदन से भारत लौंटी तो देश की राजनीति में दिलचस्पी लेने लगीं। उन्होंने गांधी जी को खत लिखा। 1930 के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता दिखाने लगीं। राज कुमारी अमृत कौर के निधन पर न्यूयार्क टाइम्स ने लंबी खबर प्रकाशित की।


 संदर्भ -
1 https://www.nytimes.com/1964/02/07/archives/rajkumari-amrit-kaur-75-dies-indias-first-minister-of-health.html
2 http://164.100.47.194/Loksabha/Members/womenar.aspx?lsno=1&tab=14
3 http://www.iccw.co.in/dared_dream.html








Sunday, 10 March 2019

खरो रुपयो चांदी को, राज महात्मा गांधी को...


आजादी के बाद से ही लोकसभा चुनाव लोकप्रिय नारों के साथ लड़े जाते रहे हैं। ये नारे काफी सृजनात्मक विरोधी पर हमला करने वाले और सवाल खड़े करने वाले होते थे। इनका जनता पर सीधा प्रभाव पड़ता था। आइए पुराने नारों पर नजर डालते हैं...

1952 के पहले चुनाव में नारे लगते थे

खरो रुपयो चांदी को, राज महात्मा गांधी को...

भले गांधी जी का निधन हो चुका था पर कांग्रेस गांधी की विरासत को ढो रही थी। लोग कांग्रेस के राज को गांधी का राज ही मानते थे।
 तब जन संघ मुख्य विरोधी पार्टी हुआ करती थी। सन साठ के दशक का नारा जनसंघ का नारा था -

जली झोपड़ी भागे बैल,  यह देखो दीपक का खेल

तब जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक था.

इस नारे का कांग्रेस ने जवाब दिया-  

इस दीपक में तेल नहीं

सरकार बनाना खेल नहीं

जन संघ का एक और नारा था

हर हाथ को काम, हर खेत को पानी, हर घर में दीपक, जनसंघ की निशानी

साठ के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी का नारा हुआ करता था -

देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है...

साठ के दशक में सोशलिस्ट नेता राम मनोहर लोहिया ने जब नारा दिया था-

 ‘सोशलिस्टों ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’ 

सन 1971 में कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी का नारा था

गरीबी हटाओ

इंदिरा भाषण क अंत में कहती थीं वे कहते हैं इंदिरा हटाओ मैं कहती हूं गरीबी हटाओ.. नारा हिट हुआ, इंदिरा गांधी वापस आईं....पर तब इसके जवाब में विरोधियों का नारा

देखो इंदिरा का ये खेल, खा गई राशन पी गई तेल


इस दौर में एक नारा कांग्रेस ने अंग्रेजी में भी बनाया था - वोट फॉर कॉफ एंड काउ, फारगेट ऑल अदर्स नाउ। तब कांग्रेस का चुनाव चिन्ह गाय और दूध पीता हुआ बछड़ा हुआ करता था। 
इमरजेंसी के बाद के 1977 के चुनाव से पहले खूब चुनावी नारे बने। इस दौरान नारों के स्तर में गिरावट भी आई।

जमीन की चकबंदी में

मकान गया हदबंदी मे

द्वार खड़ी औरत चिल्लाए

मेरा मरद गया नसबंदी में

एक और नारा

नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा संजय बंसीलाल

एक और नारा

जगजीवन राम की आई आंधी, उड़ जाएगी इंदिरा गांधी

सन 1977 में जय प्रकाश नारायण ने नारा दिया- 

इंदिरा हटाओ, देश बचाओ

सन 1980 में कांग्रेस ने इसके जवाब में नारा बनाया

इंदिरा लाओ देश बचाओ, सोने का ये वक्त नहीं

सन 1977 में जब देश में जनता पार्टी का शासन आया तो राजनीति में गंदे नारों की बाढ़ आ गई। जीत के जश्न में अघाए जनता पार्टी के लोगों ने कांग्रेस के लिए एक से बढ़कर एक गंदे नारे बनाए। इनमें से तमाम नारे जाति सूचक और अपमान जनक भी थे। पर उनके उन्माद भरे नारों का दौर जल्द ही चला गया। 

सन 1978 में इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमंगलूर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में कांग्रेस ने नारा दिया - एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर, चिकमंगलूर। ये नारा हिट हुआ और इंदिरा गांधी ने चिकमंगलूर से जीतकर शानदार वापसी की।  

साल 1980 में कांग्रेस पार्टी का चुनाव चिन्हा था हाथ. कांग्रेस से लिए हिंदी के कवि श्रीकांत वर्मा ने नारा लिखा-

न जात पर न पात पर

इंदिरा जी की बात पर

मुहर लगेगी हाथ पर

सन 84 में इंदिरा गांधी की शहादत के बाद कांग्रेस का नारा था

जब तक सूरज चांद रहेगा

इंदिरा तेरा नाम रहेगा।

कुछ नारे व्यक्तिवादी भी बने।  1989 में वीपी सिंह के लिए नारे लगे

राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है...

चुनाव में नारे तो 1990 के बाद भी बनते रहे हैं पर उनमें पहले जैसी बात नजर नहीं आती।
सन 1999 में भाजपा ने नारा दिया - अबकी बारी अटल बिहारी। सबको देखा बार बार हमको देखो एक बार। ये नारे भी लोगों की जुबां पर चढ़ गए। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - Email- vidyutp@gmail.com